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जलवायु परिवर्तन : धान की फसल में रोग बढ़े, बाढ़ व सूखा बिगाड़ रहा गणित

Sun, 12 Jul 2020 04:51 AM IST
योगेश साहू मनीष मिश्र, अमर उजाला, नई दिल्ली।
मनीष मिश्र, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: योगेश साहू Updated Sun, 12 Jul 2020 04:51 AM IST
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Climate change: diseases increase in paddy crop, flood and drought is spoiling mathematics
प्रतीकात्मका तस्वीर - फोटो : पेक्सेल्स

मौसम की चाल बदलने से भारत में बाढ़, सूखा और बेमौसम बारिश लगातार बढ़ती जा रही हैं। मौसम के इस बदलाव को न समझ पा रहे किसानों को लगातार नुकसान हो रहा है। जलवायु परिवर्तन के  प्रभाव से वैज्ञानिक जिन बीमारियों व नुकसान के बारे में अपने शोध से आगाह करते आ रहे हैं, उसका असर किसान को खेतों में दिखाई देने लगा है। भारत में जलवायु परिवर्तन के कृषि पर पड़ रहे प्रभावों को दिखाती मनीष मिश्र की रिपोर्ट...



यूपी के बाराबंकी जिले के किसान रामसांवले शुक्ला धान की खेती से इसलिए परेशान हैं कि उन्हें पता ही नहीं रहता कि मानसून के दौरान कब क्या होने वाला है? कभी पानी पहले बरस जाता है, वहीं जब जरूरत होती है बारिश नहीं होती। जब बारिश होती है तो इतनी कि फसल चौपट, बाकी समय सूखा।

रामसांवले जलवायु परिवर्तन के बारे में तो अच्छे से नहीं जानते पर ये बदलाव वो अपनी धान की फसल के दौरान कई वर्षों से महसूस कर रहे हैं। रामसांवले कहते हैं, कभी समय पर बारिश नहीं होती, धान की फसल में रोग अधिक लगने लगे हैं, सो अलग।

धान की खेती में मानसून की अनिश्चितता के मंडराते बादलों से रामसांवले की तरह देश के करोड़ों किसान परेशान हैं, जिनका रोग से बचाव व सिंचाई का खर्च बढ़ने नुकसान अधिक हो रहा है।

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प्रतीकात्मका तस्वीर - फोटो : अमर उजाला

फिलीपींस की राजधानी मनीला में अंतरराष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान के साउथ एशिया रीजनल सेंटर के निदेशक अरविंद कुमार कहते हैं, जिस तरह से भारत में तापमान बढ़ रहा है, धान की फसल में नई-नई बीमारियां और कीटाणु पैदा होंगे। जैसे-फाल आर्मी वार्म का हमला बढ़ गया है।

बारिश की अनिश्चितता के बीच जो हमारी नई धान की किस्में हों उनमें सब कुछ सहने की क्षमता हो। अधिक तापमान के लिए हम अभी जीन खोज रहे हैं। अब ऐसी किस्में अधिक निकालनी होंगी जो बाढ़ और सूखा दोनों को झेलें। बाढ़ के लिए हमने कुछ किस्में निकाली हैं जिनका परिणाम अच्छा है। अब हमारी तैयारी सूखे में पैदा होने वाली धान की किस्में निकालने की है।

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प्रतीकात्मका तस्वीर - फोटो : पीटीआई

विकसित की जा रहीं नई किस्में
हैदराबाद में केंद्रीय बारानी भूमि अनुसंधान संस्थान के प्रिंसिपल इन्वेस्टिगेटर डॉ. एम प्रभाकर कहते हैं, जलवायु परिवर्तन से फसलों के उत्पादन पर पड़ने वाले संभावित असर को कम करने के लिए हम ‘निक्रा’ प्रोजेक्ट के तहत नई किस्में विकसित कर रहे हैं। देशभर के 151 जिलों में 446 गांवों को जलवायु परिवर्तन से लड़ने को मॉडल गांव के तौर पर विकसित किया गया है। राज्य सरकारें आगे अन्य गांवों तक इस तकनीक को लेकर जाएं। 

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प्रतीकात्मका तस्वीर - फोटो : PTI

यूपी के 48 जिले अति उच्च संकट में
कृषि पर जलवायु परिवर्तन के असर को दिखाती वर्ष 2019 में केंद्रीय बारानी भूमि अनुसंधान संस्थान द्वारा ‘निक्रा’ परियोजना के तहत जारी रिपोर्ट में देश के 310 जिले उच्च से अति उच्च संकट में हैं। इसमें सबसे अधिक यूपी के 48 जिले उच्च से अति उच्च संकट की श्रेणी में हैं। जलवायु परिवर्तन से कृषि को बचाने के लिए नीतियां बनाते समय इन जिलों को सर्वोच्च प्राथमिकता पर रखने की सिफारिश की गई है।

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay

अधिक तापमान से धान के परागण पर पड़ता है असर
उत्तराखंड के पंतनगर विवि मेंजेनेटिक्स एंड प्लांट ब्रीडिंग के क्षेत्र में कार्य कर चुके डॉ. सुरेन्द्र सिंह कहते हैं कि जब तापमान बढ़ेगा तो परागण कम होगा, परागण के लिए कम तापमान और बारिश चाहिए। धान की पैदावार के लिए आद्रता ज्यादा होनी चाहिए। धान की अच्छी पैदावार के लिए अधिकतम आर्द्रता 80 व कम से कम 50 होनी चाहिए। जलवायु परिवर्तन का असर तराई इलाके में ज्यादा आएगा।

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