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जो तर्कों से डरते हैं

Wed, 21 Aug 2013 07:34 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Wed, 21 Aug 2013 07:34 PM IST
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who dares from arguments

अंधविश्वास और कुरीतियों के खिलाफ लंबी लड़ाई लड़ने वाले डॉ नरेंद्र दाभोलकर की पुणे में हुई हत्या स्तब्ध करने वाली है। इससे पता चलता है कि आज भी हमारे बीच मध्ययुगीन मानसिकता वाले लोग मौजूद हैं, जिनके लिए तर्कों का कोई अर्थ नहीं है। कुरीतियों और रूढ़िवादियों के खिलाफ अभियान चलाने की वजह से वह ऐसे लोगों की आंखों की किरकरी बन गए थे, जो लोगों की अज्ञानता का फायदा उठाकर अपनी दुकानें चलाते हैं।

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हैरत की बात है कि आज भी ग्रामीण अंचल ही नहीं, शहरों तक में अंधविश्वास गहरे तक जड़ें जमाए बैठा है, जिस कारण दैवीय प्रकोप से बचने के लिए कभी किसी बच्चे की बलि दे दी जाती है, तो कभी जादू-टोने के नाम पर किसी महिला को निर्वस्त्र घुमाया जाता है। उनकी लड़ाई सिर्फ अंधविश्वास तक सीमित नहीं थी, उन्होंने जाति पंचायतों की जड़ता और लैंगिक असमानता जैसे मुद्दे भी उठाए और स्वयंभू धर्मगुरुओं और बाबाओं को भी चुनौती दी।
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डॉ दाभोलकर आस्था और अंधविश्वास के महीन अंतर को बखूबी समझते थे और उनकी पहल से ही महाराष्ट्र के अनेक मंदिरों में महिलाओं को प्रवेश मिल सका था। उनका कुसूर बस यही था कि अपनी अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के जरिये वह वैज्ञानिक तर्कों के साथ लोगों में जागरूकता फैलाने का काम कर रहे थे, जो पाखंडी लोगों को नागवार गुजरा।
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वह एक दशक से भी लंबे समय से महाराष्ट्र में काला जादू और अंधविश्वास उन्मूलन विधेयक को पारित किए जाने के लिए संघर्ष कर रहे थे। यह विधेयक 18 वर्षों से लंबित है, जिसे पारित करने से प्रदेश की तमाम सरकारें हिचकती रही हैं, क्योंकि एक वर्ग का मानना है कि इससे लोगों की आस्था आहत हो सकती है। असल में इसके पीछे भी गहरी राजनीति है, जिसके अर्थ समझने की जरूरत है। महाराष्ट्र की पृथ्वीराज चव्हाण सरकार ने अब जाकर इसे अध्यादेश की शक्ल में मंजूरी दी भी है, तो तब, जब दाभोलकर की हत्या कर दी गई।


वाकई प्रचलित सामाजिक धारणाओं के खिलाफ जिस साहस से वह लड़ रहे थे, वैसे उदाहरण विरले ही मिलते हैं। उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि तो यही होगी कि अंधविश्वास के खिलाफ सख्त कानून बनाया जाए और उसे पूरे देश में लागू किया जाए, क्योंकि आज भी अनेक प्रदेशों में यह बड़ी समस्या है।

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