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हिंसा की राजनीति
Updated Wed, 10 Apr 2013 10:01 PM IST
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ममता बनर्जी ने तकरीबन दो वर्ष पहले 'पोरिबर्तन' के नारे के साथ पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे को सत्ता से बेदखल जरूर कर दिया था, मगर आज भी वहां की राजनीतिक संस्कृति में कोई बदलाव आया हो, ऐसा नहीं लगता।
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योजना भवन के सामने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और उनके वरिष्ठ मंत्री अमित्र मित्रा के साथ माकपा की छात्र इकाई के कार्यकर्ताओं की बदसुलूकी उसी राजनीतिक शैली का हिस्सा है, जिसके दम पर वामपंथियों ने चार दशक तक राज्य में सत्ता कायम कर रखी थी।
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निश्चय ही, एसएफआई के कार्यकर्ता अपने एक नेता सुदीप्तो गुप्त की कथित तौर पर पुलिस हिरासत में हुई मौत से नाराज होंगे, मगर एक मुख्यमंत्री के खिलाफ इस तरह के हिंसक प्रदर्शन को लोकतांत्रिक नहीं कहा जा सकता।
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इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि यह घटना तृणमूल और वाम मोर्चे के बीच पिछले कुछ महीने से जारी टकराव का नतीजा है, जो अब देश की राजधानी तक आ पहुंचा है।
वामपंथियों ने लंबे शासन के दौरान ऐसी राजनीतिक शैली विकसित कर ली थी, जिसमें राजनीतिक विरोधियों और आलोचकों के लिए जगह ही नहीं थी।
यह बात राइटर्स बिल्डिंग से लेकर पंचायत स्तर तक देखी जा सकती थी, जहां पार्टी कैडर के लिहाज से ही सारी चीजें तय हो रही थीं।
लेकिन ममता बनर्जी ने उसी के तरीकों का सहारा लिया, मानो लोहे को लोहा ही काटता है! मगर सत्ता में आने के बाद भी वह विपक्षी नेता जैसा व्यवहार करती आई हैं, जिसकी झलक योजना भवन में भी दिखी, जहां से वह बिना बैठक के ही लौट गईं। यह अफसोसनाक ही है कि उनकी राजनीतिक शैली में किसी तरह का बदलाव नहीं आया है।
आज भले ही राज्यपाल एम के नारायणन ने ममता और मित्रा के खिलाफ हुए प्रदर्शन की निंदा की हो और माकपा पोलित ब्यूरो तक से माफी मांगने की मांग कर रहे हों, मगर जब तृणमूल कार्यकर्ताओं ने राज्य के एक पूर्व मंत्री पर हमला किया था, तब उन्होंने तृणमूल पर 'गुंडागर्दी' करने तक का आरोप जड़ दिया था!
चिंता की बात यह है कि तृणमूल और माकपा का टकराव सड़कों पर पसरता जा रहा है, इसे जल्दी नहीं रोका गया, तो पश्चिम बंगाल हिंसा के उस दौर में चला जाएगा, जहां से जल्दी निकलना आसान नहीं होगा।