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नई राह पर नेपाल

Mon, 12 Oct 2015 07:33 PM IST
अमर उजाला, नई दिल्ली
अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Mon, 12 Oct 2015 07:33 PM IST
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Nepal on new path

खड्गा प्रसाद शर्मा ओली की नेपाल के अड़तीसवें प्रधानमंत्री के रूप में ताजपोशी के बाद उम्मीद करनी चाहिए कि हिमालय की गोद में बसे इस देश में जल्द ही स्थिरता कायम हो सकेगी। अपने लंबे राजनीतिक और संघर्षपूर्ण जीवन में 14 वर्ष जेल में बिताने वाले इस कम्युनिस्ट नेता के लिए यह एक निर्णायक क्षण है। उन्होंने नेपाली कांग्रेस के पूर्व प्रधानमंत्री सुशील कुमार कोइराला को पराजित कर संसद के भीतर अपनी पकड़ साबित की है।

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इसके साथ यह भी सच है कि राजशाही के खत्म होने के बाद विगत एक दशक से नेपाल राजनीतिक रूप से बेहद उथल-पुथल के दौर से गुजरा है और बची-खुची कसर इस वर्ष आए भीषण भूकंप ने पूरी कर दी। नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (एकीकृत मार्क्सवादी, लेनिनवादी) के नेता ओली ने ऐसे समय देश की कमान संभाली है, जब देश राजशाही खत्म होने के बाद सबसे संकटपूर्ण दौर से गुजर रहा है।
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राष्ट्र के पुनर्निर्माण के साथ ही, वह इस सच से इन्कार नहीं कर सकते कि उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती मधेसियों और थारू जनजाति सहित अन्य असंतुष्ट समुदायों का विश्वास जीतने की होगी। पिछले महीने ही नेपाल ने 67 साल के इतिहास में सातवें संविधान को मंजूरी देकर खुद को एक धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित कर देश को सात प्रांतों में विभाजित करने का फैसला किया था; और तभी से मधेसी इस नई व्यवस्था के खिलाफ हैं। हालत यह है कि भारत की लगती सीमा पर आर्थिक नाकेबंदी की स्थिति बनी हुई है, जिससे नेपाल में ईंधन सहित रोजमर्रा की चीजों का संकट पैदा हो गया है। ओली का अब तक का रुख मधेसियों के प्रति कठोर रहा है, पर उन्हें स्वीकार करना होगा कि वह अब एक पार्टी के नेता नहीं, बल्कि पूरे देश के प्रधानमंत्री हैं।
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बेशक, मधेसियों का मुद्दा नेपाल का आंतरिक मुद्दा है, लेकिन इसका असर भारत के साथ उसके रिश्ते में भी साफ देखा जा सकता है। चीन से नेपाल के रिश्ते को निरपेक्ष रखकर भी देखें, तो भारत की हमेशा कोशिश रही है कि नेपाल में राजनीतिक रूप से स्थिरता कायम रहे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ओली के निर्वाचन के तुरंत बाद बधाई देकर यही जतलाने की कोशिश की है कि ऐसे समय, जब नेपाल एक नई राह पर चलने को तैयार है, भारत उसके साथ खड़ा है।

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