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अतीत के जख्म

Mon, 04 Mar 2013 01:52 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Mon, 04 Mar 2013 01:52 PM IST
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injuries of past

समकालीन दुनिया में बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम के दौरान जिस तरह की हिंसा और बर्बरता की गई थी, वैसे मामले विरले ही होंगे। 1971 के स्वतंत्रता आंदोलन में पाकिस्तानी फौज के साथ ही जमाते इस्लामी जैसे संगठन ने अमानवीयता की सारे हदें ही तोड़ दी थीं।

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ढाका के शाहबाग चौक में जुटे प्रदर्शनकारी यदि युद्ध अपराधियों को मौत की सजा देने की मांग रहे हैं, तो उनका दर्द समझा जा सकता है। मगर यह विडंबना ही है कि इंटरनेशनल वार क्राइम ट्रिब्यूनल द्वारा युद्ध अपराधियों को सुनाई गई सजा के खिलाफ ऐसे लोग सड़कों पर हिंसा कर रहे हैं, जिन्होंने कभी बांग्लादेश के निर्माण का विरोध किया था। वहां भड़के दंगों को काबू नहीं किया गया, तो यह देश एक बार फिर अराजकता के दौर में चला जाएगा।
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यह नहीं भूलना चाहिए कि 2006 में पिछली बीएनपी और जमात की सरकार के कार्यकाल के खत्म होने के बाद वहां कट्टरता और हिंसा भड़क उठी थी, जिसका फायदा उठाकर फौज और सर्वोच्च अदालत ने कमान अपने हाथ में ले ली थी। 2008 में हुए चुनाव के बाद एक फिर यह देश लोकतंत्र की राह पर लौटा था और अमूमन पिछले चार-पांच वर्षों में वहां स्थिरता ही रही है।
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प्रधानमंत्री शेख हसीना ने तो इंटरनेशनल वार क्राइम ट्रिब्यूनल का गठन अतीत की गलतियों को सुधारने के लिए किया था, जैसा कि ट्रिब्यूनल के प्रमुख जस्टिस एटीएम फजल कबीर ने कहा भी, 'अतीत के अन्याय को दूर किए बिना भविष्य में न्याय की उम्मीद नहीं की जा सकती'। बांग्लादेश की स्थिति वाकई हमारे लिए भी चिंता का कारण है, क्योंकि खासतौर से पूर्वोत्तर के राज्यों की स्थिरता के लिए वहां भी स्थिरता जरूरी है।


इस पड़ोसी के साथ हमारे रिश्ते प्रकारांतर में मजबूत ही हुए हैं। अभी भले ही विपक्षी बीएनपी की नेता खालिदा जिया ने अपनी पहली विदेश यात्रा पर बांग्लादेश पहुंचे राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से अपनी मुलाकात रद्द कर दी, मगर इससे द्विपक्षीय संबंधों में अंतर नहीं आना चाहिए। बेशक तीस्ता जल बंटवारा और सीमा के दोनों ओर के एन्क्लेव की अदला-बदली तथा 1974 के सीमा समझौते जैसे मसले अटके हुए हैं, लेकिन इन पर बात तभी आगे बढ़ सकती है, जब बांग्लादेश में भी राजनीतिक रूप से स्थिरता कायम रहे।

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