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जहरीली शराब का कहर
अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Sun, 21 Jun 2015 08:21 PM IST
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व्यवस्थागत लापरवाही से कोई घटना कितना भीषण रूप ले सकती है, मुंबई के मलाड-मालवणी में जहरीली शराब से हुई त्रासदी इसका ज्वलंत उदाहरण है, जहां मौत का आंकड़ा निरंतर बढ़ता जा रहा है, लेकिन महाराष्ट्र के बाहर इस त्रासदी के बारे में आश्चर्यजनक खामोशी छाई है। इतना ही नहीं, दोषी लोगों के खिलाफ कार्रवाई बहुत विलंब से हुई है, और यह नाकाफी भी है। देश के दूसरे इलाकों की तरह मालवणी की झुग्गी-बस्तियों में देसी शराब की अवैध भट्ठियां न सिर्फ लंबे समय से चल रही थीं, बल्कि आबकारी विभाग को इन भट्ठियों की पूरी जानकारी थी। इसके बावजूद अपने फायदे के लिए उसने चुप्पी साधे रखी।
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आबकारी विभाग और पुलिस-प्रशासन की इसी निष्क्रियता ने इलाके के उन गरीब लोगों की जान ली है, जो सस्ती शराब पीने आए थे, लेकिन उनकी मौत ने उनके परिजनो को शोकाहत करने के साथ-साथ उन्हें आर्थिक रूप से भी ध्वस्त कर दिया है। मालवणी के जिस ठेके की बनी शराब ने इन लोगों की जान ली है, वहां पिछले साल अप्रैल में छापा मारा गया था, और इस धंधे की सरगना को, जो अभी तक पुलिस के शिकंजे से बाहर बताई जाती है, विगत दिसंबर में पुलिस ने गिरफ्तार करने के बाद छोड़ दिया था! यही दो तथ्य यह बताने के लिए काफी हैं कि यह त्रासदी एकाएक भले हुई हो, पर इसकी पृष्ठभूमि पहले से बन रही थी।
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आग्रीपाड़ा और विक्रोली में जहरीली शराब से हुई मौतों के बाद मुंबई में देसी शराब के खिलाफ पुलिस-प्रशासन को ज्यादा सजग किया गया था। पर मालवणी की घटना ने पुलिसिया चुस्ती की पोल खोल दी है। तथ्य बताते हैं कि जहरीली शराब से हुई पहली मौत के करीब छह घंटे बाद पुलिस तंत्र सक्रिय हुआ। बताया तो यह भी जाता है कि पुलिस के जवानों ने शुरू में अधिकारियों को इस बारे में सूचित ही नहीं किया था, क्योंकि इससे उनकी असलियत खुल जाने का भय था। बेशक शराब पर पाबंदी समस्या का हल नहीं है; न ही देसी शराब तैयार करने वाली मौत की इन भट्ठियों पर अंकुश लगा पाना संभव है। पर अवैध रूप से तैयार की जाने वाली देसी शराब के खिलाफ लोगों को जागरूक कर, और पुलिस-प्रशासन को सक्रिय बनाकर ऐसे हादसों को रोका तो जा ही सकता है, जो महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल से लेकर उत्तर प्रदेश में समय-समय पर होते रहते हैं।
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