{"_id":"94223564-6c87-11e2-a797-d4ae52bc57c2","slug":"egypt-on-dangerous-turn","type":"story","status":"publish","title_hn":"खतरनाक मोड़ पर मिस्र","category":{"title":"Other Archives","title_hn":"अन्य आर्काइव","slug":"other-archives"}}
खतरनाक मोड़ पर मिस्र
नई दिल्ली
Updated Fri, 01 Feb 2013 09:23 PM IST
विज्ञापन
तहरीर चौक की जनक्रांति के दो वर्ष बाद मिस्र आज भी अस्थिरता के जिस दौर से गुजर रहा है, वह वाकई चिंताजनक है। यदि वहां राष्ट्रपति मोहम्मद मोरसी और विपक्षी दलों के बीच जल्दी किसी तरह की सहमति नहीं बनती है, तो हालात और खतरनाक हो सकते हैं।
विज्ञापन
होस्नी मुबारक के तीन दशकों की तानाशाही के खिलाफ सड़कों पर उतरने वाली जनता आज खुद को ठगा महसूस कर रही है, तो इसके लिए खुद मोरसी भी कम जिम्मेदार नहीं हैं। यह विडंबना ही है कि जनता द्वारा चुने गए मिस्र के पहले राष्ट्रपति मोरसी वहां लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करने के बजाय मुस्लिम ब्रदरहुड और सेना के हाथों की कठपुतली बन गए हैं।
विज्ञापन
नतीजतन वसंत क्रांति की दूसरी वर्षगांठ का जलसा इस वसंत के आते-आते खूनी संघर्ष में बदल गया और तीन बड़े शहरों पोर्ट सईद, स्वेज और इस्मालिया में आपातकाल लगाना पड़ा है। ताजा प्रदर्शन के दौरान महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न की घटनाएं भी हुई हैं, जिसका संज्ञान संयुक्त राष्ट्र ने भी लिया है। वहां के रक्षा मंत्री और सेना प्रमुख अब्दुल फतेह अल सिसी कह रहे हैं कि राजनीतिक संकट के चलते मिस्र बर्बाद हो सकता है। उनके बयान में क्षोभ से ज्यादा उतावलापन ही झलक रहा है।
विज्ञापन
सही बात तो यह है कि मिस्र में सही तरीके से लोकतंत्र आ ही नहीं सका है और वहां आज भी सत्ता पर सेना का ही कब्जा है। यदि बीते कुछ महीनों के घटनाक्रम पर नजर डालें, तो पिछले वर्ष जून में मोरसी के निर्वाचन के बाद से ही वहां काफी उथल-पुथल मची हुई है।
पिछले महीने रायशुमारी के जरिये मंजूर किए गए नए संविधान के मसौदे ने आग में घी डालने का ही काम किया है, क्योंकि इसमें लोकतांत्रिक मूल्यों की जमकर अनदेखी की गई है। नए संविधान में महिलाओं, बच्चों और अल्पसंख्यकों के अधिकारों के साथ ही प्रेस की आजादी पर अंकुश लगाया गया है, इसलिए विपक्षी नेता मोरसी से राष्ट्रीय सरकार के गठन के साथ ही संविधान में संशोधन की भी मांग कर रहे हैं।
यदि मोरसी और मोहम्मद अलबरदेई तथा अन्य विपक्षी नेताओं के बीच बातचीत दोबारा पटरी पर नहीं आती, तो वहां लोकतंत्र की राह कठिन हो सकती है। मौजूदा संकट के कारण मिस्र आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक रूप से कमजोर होता जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय बिरादरी को भी यह देखना चाहिए कि जल्दी राजनीतिक समाधान नहीं तलाशे गए, तो लंबी तानाशाही झेल चुका यह देश एक बार फिर अंधी सुरंग में चला जाएगा।