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बिहार के इस प्रहसन में

Fri, 20 Feb 2015 11:02 PM IST
संपादकीय
संपादकीय Updated Fri, 20 Feb 2015 11:02 PM IST
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bihar politics.

यह कोई कम संतोषजनक नहीं है कि बिहार अंततः उस राजनीतिक नौटंकी से बाहर निकल आया है, जिसके कारण पिछले कुछ समय से सरकार के जरूरी कामकाज तक ताक पर रख दिए गए थे। विश्वास मत से पहले ही नाटकीय ढंग से जीतनराम मांझी के इस्तीफा देने को नीतीश कुमार की जीत कह सकते हैं, जो रविवार को फिर से मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे। पर सच यह है कि कुर्सी की इस लड़ाई ने खुद उनकी छवि को कोई कम नुकसान नहीं पहुंचाया है। बिहार में यह स्थिति आई, तो इसके लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार खुद नीतीश ही हैं।

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आज भाजपा पर 'जाति कार्ड' खेलने का आरोप लगाते हुए वह यह क्यों भूलते हैं कि लोकसभा चुनाव में हार के बाद मांझी को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर उन्होंने भी इस प्रयोजन के तहत ही बिठाया था। सुशासन उनका मजबूत पक्ष हो सकता है, लालू यादव के साथ गठजोड़ आगामी चुनाव में उन्हें ज्यादा ताकतवर बना दे, तो भी हैरत नहीं, पर इस प्रक्रिया में वह शायद उस महादलित वर्ग का समर्थन खो दें, जो अब तक उनके साथ रहा है। फिर सत्ता के लिए लालू का साथ लेकर वह अपनी कैसी छवि पेश कर रहे हैं? जहां तक जीतनराम मांझी का सवाल है, तो अपने आपको साबित करने का एक मौका उन्हें मिला था। पर पहले अपने बेतुके बयानों-खुलासों और बाद में अनुभवहीन राजनीति का परिचय देकर उन्होंने वह मौका गंवा दिया।
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जिस राज्य में 'सामाजिक न्याय' समाज के निचले तबकों को पहले ही सत्ताशीर्ष पर पहुंचा चुका है, वहां मांझी अपने अपमान को वंचितों के क्षोभ और अभिमान से जोड़कर राजनीतिक लाभ ले पाएंगे, इसमें संदेह है। फिर छोटे से मुख्यमंत्री काल के दौरान उनका कामकाज इतना भी प्रभावशाली नहीं रहा, जिसे याद किया जाए। मुख्यमंत्री रहते हुए सवर्णों पर प्रतिकूल टिप्पणियां कर उन्होंने बहुतों को नाराज कर दिया था। ऐसे में, मौजूदा प्रसंग को 'महादलितों का अपमान' बताने वाली भाजपा लंबे समय तक मांझी का साथ दे पाएगी, इसमें संदेह है। पर यह जरूर अच्छा है कि बिहार में इस प्रहसन को अंजाम देने वालों के राजनीतिक भविष्य के लिए लंबा इंतजार नहीं करना पड़ेगा।

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