फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   India News Archives ›   words which are much famous in 2015, from Jumla to presstitute

जुमले से प्रेस्टीट्यूट तकः 15 शब्दों में 2015

Thu, 31 Dec 2015 01:37 PM IST
Updated Thu, 31 Dec 2015 01:37 PM IST
विज्ञापन
words which are much famous in 2015, from Jumla to presstitute

भारत में ‘साउंड क्लाउड’ बनाने वाली कंपनियों के लिए 2015 शायद सबसे आसान और अच्छा साल साबित होता। क्या बोला और दोहराया गया, उसमें कुछ इधर-उधर जोड़ने की गुंजाइश बची रहती, पर एक पूरा साल ले-देकर 15 शब्दों में निपट गया। सारी राजनीति, चुनाव और सामाजिक उथल-पुथल, ऐसा लगता है कि इन 15 शब्दों से बाहर नहीं निकल पाई।

विज्ञापन


मीडिया भी उसी में उलझा रहा और आभासी मीडिया उसी पर कुश्ती करता रहा। देखते हैं सन पंद्रह के सबसे आम और अहम पंद्रह शब्द कौन से रहे।

जुमला: इस साल भारतीय जनता पार्टी का सबसे ज्यादा अहित संभवतः इसी शब्द ने किया। बीजेपी अध्यक्ष ने काला धन लाने और हर खाते में 15 लाख रुपए जमा करने के वादे को ‘जुमला’ क्या कहा, विपक्ष को एक हथियार मिल गया। ऐसी संटी, जिससे वह हर नए वायदे को ‘जुमला’ कहकर बीजेपी पर जड़ सके।

विज्ञापन

दाल ने हरा दिया बिहार चुनाव

words which are much famous in 2015, from Jumla to presstitute

अरहर: सन 2014 का विवादास्पद पर लोकप्रिय नारा ‘हर हर मोदी’ साल बीतने से पहले ‘अरहर मोदी’ में बदल गया। अरहर दाल का दाम 200 रुपया किलो पार कर गया, महंगाई नियंत्रण में नहीं आई। कहा जाता है कि बिहार चुनाव में बीजेपी की दाल इसलिए भी नहीं गल पाई।

मैगी: मामला राजनीतिक नहीं था और उसे इस रूप में रखा भी नहीं गया लेकिन ‘दो मिनट’ वाले अंदाज में उसके राजनीतिक अर्थ खूब निकाले गए। बीजेपी के करीबी कहे जाने वाले बाबा रामदेव को लाभ पहुंचाने के आरोपों के बीच ‘मैगी’ के लिए दरवाजे अंततः दोबारा खोल दिए गए।

सूट-बूट: कांग्रेस पार्टी के उपाध्यक्ष राहुल गांधी के खाते में ‘सूट-बूट’ वाली टिप्पणी शायद सबसे चमकदार और प्रभावी रही। अपने नाम का सूट पहनने वाले प्रधानमंत्री पर इस फब्ती ने राहुल का भला चाहे न किया हो, वह जनस्मृति का हिस्सा बन गया।

वापसी: ‘वापसी’ की खबरों में दो बार वापसी हुई। पहली बार धर्मांतरण के संदर्भ में ‘घर-वापसी’ पर विवाद उठा तो दूसरी बार साहित्य अकादमी ‘पुरस्कार वापसी’ पर। यह 2015 का अकेला शब्द था, जिसने दो अलग-अलग संदर्भों में सत्तारूढ़ दल को विचलित किया।

विज्ञापन

साध्वी ने दिया विवादित बयान

words which are much famous in 2015, from Jumla to presstitute

भक्त: सोशल मीडिया को राजनीतिक उपकरण की तरह इस्तेमाल करने वाले बीजेपी के महारथियों को अंदाजा नहीं रहा होगा कि अपने स्थापित धार्मिक अर्थ से बाहर ‘भक्त’ इतनी बड़ी संख्या में मौजूद हो सकते हैं। भक्तों पर अंकुश न होना बीजेपी के लिए नुकसानदेह भी साबित हुआ।

दिव्यांग: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ में ‘विकलांग’ के लिए ‘दिव्यांग’ शब्द क्या सुझाया, आभासी मीडिया ने उसे तत्काल ‘भक्त’ का पर्याय बना दिया। यह बहस मुख्यधारा के मीडिया में उस तरह नहीं आई, लेकिन इंटरनेट उसका अखाड़ा बना रहा। कहा गया कि सिर्फ नाम बदलने से क्या होगा।

रामजादे: दिल्ली चुनाव के समय बीजेपी के कथित ‘नॉन स्टेट एक्टरों’ ने ‘रामजादे’ और उस शब्द के आगे ‘ह’ जोड़कर एक वर्ग को अपमानित करने का प्रयास किया, जो उलटा पड़ गया। यह बहस कुछ दिन चलकर थम गई, पर ऐसा नहीं लगता कि वह खत्म हुई है।

सहिष्णुता: यह बहस का मुद्दा हो सकता है कि भारत सहिष्णु कब था और कब नहीं। उसे नापने का पैमाना कहां है। पर यह तथ्य अपनी जगह है कि असहिष्णुता एक गंभीर मसला है और सरकारी संरक्षण या खामोशी उसे खतरनाक बनाती है। दादरी से धारवाड़ तक।

विज्ञापन

बिहार चुनाव में घमासान

words which are much famous in 2015, from Jumla to presstitute

नसीबवाला: प्रधानमंत्री मोदी ने खुद को ‘नसीबवाला’ कहा। बदनसीब लोगों की जगह उन्हें चुनने की बात की। लेकिन दिल्ली की जनता ने नसीब पर भरोसा नहीं किया और बागडोर आम आदमी पार्टी को सौंप दी।

नरभक्षी: बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान आरोप-प्रत्यारोप में तल्खी की कमी किसी तरफ नहीं थी पर लालटेन की रोशनी में एक शब्द ‘नरभक्षी’ को तमाम अलग-अलग अर्थों में पढ़ा गया। मामला चुनाव आयोग तक गया, लेकिन फैसला बिहार की जनता ने सुनाया।

पाकिस्तान: पाकिस्तान भारतीय मीडिया की खबरों से बाहर कभी नहीं रहता पर साल के अंत में जिस तरह उसकी पहले पन्ने और टेलीविजन चैनलों पर वापसी हुई, दुनिया ने उसे गौर से देखा। काबुल से दिल्ली लौटते हुए मोदी का लाहौर रुकना सकारात्मक था और उसकी तारीफ हर जगह हुई।

वीके सिंह के निशाने पर मीडिया

words which are much famous in 2015, from Jumla to presstitute

प्रेस्टीट्यूट: केंद्र सरकार के एक मंत्री ने अपनी आलोचना पर प्रेस को ‘प्रेस्टीट्यूट’ करार दिया तो महीनों इस पर लंबी बहस हुई। मीडिया के लिए गढ़े गए इस अपमानजनक आशय वाले शब्द पर बहस अब तक जारी है।

कलबुर्गी: कर्नाटक में कन्नड़ लेखक और शिक्षाविद एमएम कलबुर्गी की हत्या ने सरकार को बैकफुट पर धकेल दिया। बहस असहिष्णुता के साथ इस पर भी थी कि गोविंद पानसरे और नरेंद्र दाभोलकर की इसी तरह हत्या हो चुकी थी और जांच की गति धीमी थी। सवाल पूछे जा रहे थे कि क्या अब बहसों का अंत गोलियों से होगा?

आरक्षण: ठीक बिहार चुनाव से पहले आरक्षण पर आरएसएस प्रमुख का बयान क्यों आया, अब भी जेरे बहस है। लेकिन इतना लगभग सभी राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि बिहार में बीजेपी की हार की एक वजह वह भी थी। आरक्षण तो गया नहीं, बीजेपी के हाथ से बिहार निकल गया।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed