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रविवार को आएगा मोदी की पहली परीक्षा का परिणाम

भरत शर्मा/टीम डिजिटल Updated Thu, 05 Dec 2013 05:16 PM IST
will modi effect guide bjp to victory, waiting for sunday
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दिल्ली विधानसभा चुनावों की वोटिंग संपन्न होते ही टीवी पर एग्जिट पोल की झड़ी लगी और नतीजों से चार दिन पहले ही भाजपा के नेताओं की बांछें खिल गई। लेकिन यह पोल है, असल नतीजे नहीं।



दरअसल, भाजपा के लिए इन चुनावों में केवल चार राज्य ही दांव पर नहीं लगे, बल्कि हालिया वक्त में उभरे उनके सबसे बड़े नेता नरेंद्र मोदी की प्रतिष्ठा भी कसौटी पर रहेगी।


लोकसभा के तख्त के लिए चुनाव अब ज्यादा दूर नहीं हैं, ऐसे में विधानसभा चुनावों के नतीजों को इनके अक्स के रूप में देखा जाना स्वाभाविक है।

मोदी बने तुरुप का इक्का
यही वजह है कि दिल्ली, मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में पार्टी ने अच्छी-खासी स्थिति होते हुए कोई जोखिम नहीं लिया और अपने पुरुप के इक्के मोदी को हर जगह उतारा।

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दिल्ली में जहां मोदी को आम आदमी पार्टी की तरफ से मिली चुनौती की वजह से ज्यादा मेहनत करनी पड़ी, वहीं छत्तीसगढ़ में दोनों पक्षों के बीच कड़ी टक्कर को देखते हुए उन्होंने ज्यादा पसीना बहाया।

नतीजे जो भी रहें, लेकिन भाजपा कुछ इस तरह मोदी के रंग में रंगी कि रैलियों में मोदी की धमक दिखी, पोस्टरों पर सीएम दावेदारों के साथ वही नजर आए। यहां तक कि भाजपा के उम्मीदवार भी उनके नाम पर वोट मांगते हुए दिखे।

अगर नतीजे एग्जिट पोल के मुताबिक आए, तो यह इसमें कोई शक नहीं कि लोकसभा चुनावों की तैयारियों में जुटी भाजपा को इससे काफी बल मिलेगा और मोदी के कद में और ऊंचाई आएगी।

नतीजे खिलाफ आए, तो मोदी को खासा नुकसान
लेकिन पोल का अतीत कोई खास अच्छा नहीं रहा और नतीजों ने कई बार साबित किया कि पोल, आखिर संभावनाओं की नींव पर खड़े अनुमान हैं, अंतिम नतीजे नहीं। देश का मतदाता भाजपा का दिल रख भी सकता है और तोड़ भी सकता है।

अगर नतीजे भाजपा के माकूल नहीं आए, तो यह मोदी के लिए बड़ा झटका साबित होगा, जिनके चेहरे और नाम पर इन दिनों भगवा पार्टी मरने-मिटने को तैयार है।

जाहिर है, मोदी की ताकत झोंकने के बावजूद अगर भाजपा कम से कम तीन राज्यों में सत्ता में नहीं पहुंची, तो इन कयासों को ताकत मिलेगी कि देश में मोदी की कोई लहर नहीं, बल्कि माहौल बनाया जा रहा है। ऐसी सूरत में पार्टी को लोकसभा चुनावों की रणनीति में कुछ बदलाव भी करने पड़ सकते हैं।

लेकिन भगवा दल को इस बात पर पूरा यकीन है कि कांग्रेस और यूपीए से चिढ़ा बैठा देश अब बदलाव चाहता है और मोदी में उसी बदलाव की झलक देख रहा है।

तीन महीने में बदली पूरी रणनीति
राजनीति का खेल कुछ ऐसा है कि यह इन्हीं मोदी के नाम पर दो-तीन महीने पहले तक बहस जारी था और पार्टी का एक धड़ा कह रहा था कि विधानसभा चुनाव के नतीजे आने तक मोदी के नाम का ऐलान पीएम पद के लिए नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन हालात कुछ ऐसे बने कि आखिरकार मोदी ही विधानसभा चुनावों में भाजपा के सबसे बड़े मोहरे साबित हुए।

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भाजपा के नेताओं का मानना है कि विधानसभा चुनावों के वक्त भले तमाम राजनीतिक दलों ने 'मोदी फैक्टर' को गैरजरूरी बताया हो, लेकिन वह न केवल पार्टी के प्रचार सेनापति साबित हुए, बल्कि जहां उनकी रैलियां हुईं, वहां उम्मीद है कि पार्टी के ज्यादा वोट भी मिले।

भाजपा की उम्मीदें आसमान पर
भाजपा के प्रचार अभियान की बात करें, तो दूसरे तमाम वरिष्ठ नेता एक पलड़े में दिखे और मोदी दूसरे में। विधायक बनने की जुगत में लगे नेताओं ने बार-बार मोदी की रैलियों की डिमांड की।

कांग्रेस के युवा सिपहसालार राहुल गांधी की तुलना में मोदी ने जोर भी ज्यादा लगाया और यही वजह है कि भाजपा की उम्मीदें आसमान छू रही हैं।

भाजपा देश में मोदी की लहर की कसमें खा रही है और विरोधियों का कहना है कि यह ब्लोअर की हवा है। रविवार को जहां सियासी दलों में बेचैनी की गर्माहट रहेगी, वहीं ईवीएम मशीन बताएगी कि मोदी की आंधी है या पंखे की हवा!

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