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विनायक दामोदर सावरकर: नए निजाम के नए नायक

Sat, 28 May 2016 06:45 PM IST
रिज़वान/अमर उजाला, दिल्ली
रिज़वान/अमर उजाला, दिल्ली Updated Sat, 28 May 2016 06:45 PM IST
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Vinayak Damodar Savarkar birth anniversary special

नयी सरकारों के साथ नये हीरो आते हैं और पुराने रिटायर हो जाते हैं। हर सरकार ये करती है, आजकल ये काम खूब चल ही रहा है। ऐसे ही एक हीरो हैं जो बाजपेयी सरकार ने हमारे सिर लादा और फिर लगातार लादा जा रहा है। ये हैं विनायक दामोदर सावरकर, जिन्हें वीर सावरकर के नाम से भी जाना जाता है। सावरकर की आज जयंती है। पिछले कुछ सालों में सावरकर देश के नए हीरो बनकर उभरे हैं। 90 के दशक में राम मंदिर आंदोलन, भारतीय राजनीति में हिंदुत्व के उभार और 1998 में अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार ने सावरकर को भारत के इतिहास में एक नया स्थान दिया। अमूमन जब कोई नयी विचारधारा उभरती है तो उसको कुछ नायकों की जरूरत होती है। कांग्रेस और कम्युनिस्टों के पास अपने आदर्श थे। समाजवाद के नाम पर उभरे लालू और मुलायम जैसे लोगों के पास अपने नेता हैं। उत्तर प्रदेश में मायावती का उभार हुआ तो उनके पास अंबेडकर और काशीराम हैं।

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खैर, बात सावरकर की कर रहे थे। हिंदुत्व के नाम पर राजनीति करने वालों के पास चेहरों की हमेशा कमी रही है। जब 90 के दशक के बाद जब भारतीय जनता पार्टी एक ताकत के तौर पर उभरने लगी तो उनको ऐेसे चेहरों की तलाश थी जो गांधी, अंबेडकर और लोहिया को टक्कर दे। ऐसे में एक हीरो तलाशा गया विनायक दामोदर सावरकर। ऐसा तो नहीं कि पहले कभी किसी ने सावरकर का नाम नहीं सुना था लेकिन हिंदू महासभा और दूसरे दक्षिणपंथी संगठनों के कार्यक्रम से बाहर उनका नाम बहुत मशहूर नहीं रहा।
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जैसे-जैसे भाजपा को ताकत मिली, सावरकर के नाम पर सड़क-चौराहों के नाम रखने का दौर शुरू हुआ। 4 मई 2002 को उस समय के गृहमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी ने पोर्ट ब्लेयर हवाई अड्डे का नामकरण वी डी सावरकर हवाई अड्डा कर दिया तो ये नाम बहुत से लोगों के लिए नया था। इसके बाद फरवरी 2003 में संसद के केन्द्रीय कक्ष में सावरकर की तस्वीर का अनावरण हुआ। सावरकर की तस्वीर को गांधी जी की तस्वीर के सामने लगाया गया। ये कोशिश थी इस बात को बताने की कि सावरकर और गांधी का आजादी की लड़ाई में बराबर का स्थान है। विचारधाराओं को अलग रख दे तो ये इसलिए भी कमाल की बात है क्योंकि सावरकर वो नाम है जिनको गांधी की हत्या के मामले में गिरफ्तार किया गया। ऐसा अजब संयोग शायद ही किसी पार्लियामेंट में देखने को मिले। हालांकि ये एक अलग बात है कि गांधी जी की हत्या में सावरकर पर आरोप साबित नहीं हो सके।
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कमाल की बात ये है कि जब कांग्रेस को लगा कि सावरकर हिंदुत्व का चेहरा बन रहे हैं, तो कांग्रेस ने उनको भाजपा से छीनने की एक कोशिश भी की। महाराष्ट्र के होने के नाते सावरकर का चित्र महाराष्ट्र विधान सभा मे लगाया गया। कमाल ये है कि ये काम इससे पहले भाजपा और शिवसेना की 'राष्ट्रवादी' सरकारों को याद नहीं आया। हाल ही में असहिष्णुता पर छिड़ी बहस के बीच अरुंधति रॉय ने कहा था कि 'भाजपा जो दिन में करती है कांग्रेस रात में'। ये इसी तरह की हुनरबाजी का नमूना था। खैर, बात सावरकर की चल रही है तो ऐसा क्या है उनकी जिंदगी में जो उन्हें गांधी के बराबर में संसद में जगह दिलाता है और गाधी की हत्या में उनकी गिरफ्तारी भी होती है।

निदा फाजली का एक मशहूर शेर है...

हर आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी
जिसको भी देखना कई बार देखना।

ये शेर सावरकर की जिंदगी पर भी सटीक बैठता है। सावरकर कभी आजादी के योद्धा हैं तो कभी फिरंगियों के भक्त। कभी हिन्दू-मुसलमान उनको देश की आंख के दो तारे लगते हैं तो कभी मुसलमान उनको देश की सबसे बड़ी समस्या। महारष्ट्र में 1883 में एक जमींदार परिवार में सावरकर पैदा हुए। जवान होते सावरकर का भी एक ही सपना था, देश की आजादी। जब सावरकर जवान हो रहे थे तो देशभर में अंग्रेजों के खिलाफ माहौल बन रहा था और सावरकर भी इससे अछूते नहीं थे। पढ़ाई करते हुए ही वो 'अभिनव भारत' नाम के एक संगठन से जुड़ गए। जो भारत की आजादी के सपने देखता था। स्कूल के बाद पढ़ाई के लिए लंदन गए लेकिन दिल-दिमाग पर भारत की आजादी छाई हुई थी। वहां मदन लाल धींगड़ा नाम के क्रान्तिकारी के संपर्क में आए और 'फ्री इंडिया सोसायटी' नाम की संस्था से जुड़ गए। इसी दौरान एकदम से सावरकर की जिंदगी बदली जब मदन लाल धींगड़ा ने एक अंग्रेज अधिकारी की हत्या कर दी।

सावरकर को इस हत्या में शामिल होने के लिए गिरफ्तार कर लिया गया। सावरकर को पानी के जहाज से जब भारत लाया जा रहा था तो वो जहाज से कूद कर फरार हो गए। ये साहस अपने आप में काबिले-दाद था। हालांकि ये मेहनत ज्यादा काम ना आई और उन्हें फ्रांस में गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद चले मुकदमों में उनको दो उम्रकैद की सजा दी गई। दो उम्रकैद यानि पचास साल  की सजा, पचास साल की सजा पूरी करने के लिए उन्हे सेलुलर जेल भेज दिया गया। इस दौर तक सावरकर की लिखी किताब 'द इंडियन वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस' खासी मशहूर हो चुकी थी। इस किताब को भारत में छापने की अनुमति अंग्रेज सरकार ने नहीं दी थी लेकिन विदेश में छपकर चोरी-छिपे ये देश के युवाओं के पास पहुंच चुकी थी। इस किताब में सावरकर ने 1857 की क्रान्ति में हिन्दू-मुस्लिम एकता की तारीफ की और कई मुसलमान लड़ाकों की बहादुरी की खुलकर सराहना की। यहां तक कि कुछ हिन्दू राजाओं की अंग्रेजों का साथ देने के लिए लानत-मलानत करने में भी कोताही नहीं बरती।

जेल जाने के बाद सावरकर की दूसरी जिंदगी शुरू होती है। जहां उनके दुश्मन और आदर्श दोनों बदल जाते हैं। जेल आने के कुछ दिन बाद ही उन्होंने माफी के लिए अर्जियां देनी शुरू कर दीं। आर सी मजुमदार, धनंजय कीर और शम्सुल इस्लाम जैसे विद्वानों ने सावरकर पर काफी लिखा है। उनकी जेल की जिंदगी पर लिखने वाले इस बात पर हैरान होते हैं कि जहां कालापानी की सजा पाए कैदियों पर जुल्म ढाए जाते थे वहीं सावरकर जेल अधिकारियों के चहेते थे। 1911 में जेल आए सवारकर 1920 तक जेल के कई काम देखने लगे थे और अधिकारी उन पर बेहद भरोसा करने लगे थे। आखिरकार सावरकर अंग्रेज अधिकारियों के रिझाने में कामयाब रहे और 1921 में सजा पूरी करने के लिए उन्हें भारत की रत्नागिरी जेल भेज दिया गया। 1924 में रत्नागिरी की यरवदा जेल से इस शर्त पर रिहा कर दिया गया कि वो कोई राजनीतिक कार्यक्रम नहीं करेंगे, ना ही किसी सियासी जलसे का हिस्सा बनेंगे। इस तरह 13 साल में उनकी पचास साल (दो उम्रकैद) की सजा पूरी हो गई। 1937 में जो कुछ प्रतिबंध कागजों पर सावरकर पर चल रहे थे, वो भी खत्म कर दिए गए।

रत्नागिरी जेल और इसके बाद भी सावरकर को मुंजे और हेडगवार से मिलने और हिंदू महासभा के कार्यक्रमों के लिए खुली छूट मिली। अब जो सावरकर था वो आजादी के सपने नहीं देखता था बल्कि हिन्दू राष्ट्र के सपने देखता था। बदले हुए सावरकर ने एक और किताब लिखी, इस बार नाम था 'हिंदुत्व'। ये किताब किसी हिन्दू-मुस्लिम एकता की नहीं बल्कि हिंदुओं के शस्त्रीकरण की बात करती है। अब सावरकर को लगने लगा कि हिन्दु-मुसलमान साथ नहीं रह सकते। ये वही दौर था जब मुस्लिम लीग भी लोकप्रिय हो रही थी। दूसरी तरफ सावरकर की देखरेख में 'शुद्धि' (मुस्लिमों को फिर से हिन्दू धर्म में लाना), मस्जिदों के सामने लाउडस्पीकर बजाना और मंदिरों पर लाउडस्पीकर लगाने का काम खूब जोर-शोर से चल रहा था। सावरकर और मुस्लिम लीग अपनी-अपनी तरह से दो-राष्ट्र के सिद्धान्त के साथ खड़े थे।

आजादी मिली तो सावरकर और हिन्दू महासभा ने भगवा झंडे को साथ फहराया। इसके बाद गांधी जी की नाथूराम गोडसे ने हत्या कर दी। ये कत्ल किसकी सरपरस्ती में हुआ? गांधी जी की हत्या के बाद एक पत्र में सरदार पटेल ने नेहरू को पत्र में स्पष्ट लिखा कि सावरकर के नेतृत्व वाली हिन्दू महासभा इस साजिश में शामिल है। हालांकि सावरकर गांधी जी की हत्या के मामले मे गिरफ्तार हुए और छूट गए, आरोप साबित नहीं हुए। सरदार पटेल सावरकर के बारे में क्या सोचते थे, ये इससे भी साफ है कि पाक प्रधानमंत्री जब पहली बार भारत आए तो सावरकर को पुलिस ने एहतियातन गिरफ्तार कर लिया कि कहीं वो कोई हंगामा ना खड़ा करें।

सावरकर आजादी के बाद भी हमेशा हिन्दुओं को हथियार चलाने में पारंगत होने और भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने के लिए प्रत्यनशील रहने का आह्वान करते रहे। बैरिस्टर सावरकर ने फरवरी 1966 में अन्न-जल त्याग दिया। 26 फरवरी 1966 को सवारकर इस दुनिया को छोड़ गए तो ये किसी नायक के चले जाना जैसा नहीं था। तब तक पूरा महाराष्ट्र भी उनको नहीं जानता था। अपनी मौत के बाद के बहुत दिन बाद किसी पुरानी तस्वीर को झाड़-पोंछ कर चमाकाने की तरह उनको नायक बनाने का काम शुरू हुआ।


बाजपेयी सरकार के शुरू किए इस काम को अब मोदी सरकार खूब बढ़िया से आगे बढ़ा रही है। 'गद्दारों' को किताबों, चौराहों, हवाई अड्डों से हटाया जा रहा है और 'राष्ट्रभक्तों' को लाया जा रहा है। तमाम सूबों में किताबों में हो रहे बदलाव के बारे में आप पढ़ ही रहे होंगे। खैर, सावरकर अब नये हीरो हैं हालांकि वो हिन्दू राष्ट्र के लिए हीरो हैं, शुद्धि के लिए हैं, अंग्रेजों की 'गुलामी' के लिए, माफी की अर्जी के लिए, गांधी जी की हत्या में नाम आने के लिए, तिरंगा पर भगवा को अहमियत देने के लिए फिर कोई और वजह?

( डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं)

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