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किसी ने खोए अपने तो किसी ने सपने, 5 कहानियां
रुद्रप्रयाग/गोपेश्वर/ब्यूरो
Updated Thu, 20 Jun 2013 01:53 AM IST
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देवभूमि में एकाएक कुपित हुई कुदरत की क्रूरता की मार सही नहीं जाती। किसी ने अपने खोए हैं तो किसी ने सपने।
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नुकसान इतना बड़ा है कि अंदाजा लगाना नामुमकिन है। भला अपनों और सपनों का कोई मोल आंक सकता है। हर ओर हाहाकार है। अपनों को खोने के गम के साथ ही कहीं से मदद न मिल पाने का गुस्सा है।
बेबसी क्या चीज होती है ममता पार्क सोसायटी कापोदरा सूरत गुजरात के भीम भाई से पूछिए। केदारनाथ आए थे।
मौसम खराब हुआ तो पत्नी का कमजोर दिल उसे सह नहीं पाया। दिल का दौरा पड़ गया। आंखों के सामने पत्नी तड़प-तड़प कर दम तोड़ गई। डॉक्टरी मदद नहीं मिली।
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सूनी आंखों से कहते हैं कि सड़क सही होती और साधन होते तो पत्नी यूं न मरती।
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दिल्ली के वसुंधरा एन्क्लेव निवासी राधाकृष्ण ने बताया कि उनके परिचित आनंद, शीला और सौम्या केदारनाथ यात्रा पर आए थे, लेकिन 16 की शाम से उनका कोई पता नहीं चल पाया है। आपदा प्रबंधन के सभी नंबर खड़काए कोई जानकारी नहीं मिल पा रही है।
तस्वीरों में देखिए: तबाही का मंजर
कल्योण, उज्जैन मध्य प्रदेश से मांगलू सिंह 30 लोगों के साथ बाबा केदार के दर्शन करने आए थे। उनके साथ के सिर्फ दो लोग ही बचे हैं।
असम के नवीन गोस्वामी और उनके परिजनों को गौरीगांव के लोगों ने चार दिन से बचाव दल की राह देख रहे हैं कि कोई तो आकर उन्हें निकालेगा। गांव में खाने-पीने का सामान भी खत्म हो चुका है।
हेलीकॉप्टर से बिस्कुट के पैकेट गिरे लेकिन वे मिट्टी और कीचड़ में सनकर खराब हो गए। कहते हैं कि अब तो बचने की उम्मीदें भी धूमिल हो चली हैं। ये आपदा के मारों के चंद नमूने हैं।
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उत्तराखंड में इस वक्त कुदरत ने ऐसी अनगिनत कहानियों की पटकथा लिख दी है जिसमें बेबसी, संत्रास, गम, गुस्से और लाचारी की ऐसी दास्तां है कि सुनने वाले का कलेजा फट पड़े।
करनाल के तीर्थयात्री अमरिंदर सिंह, निरवेद सिंह और अमरजीत सिंह ने बताया कि 16 जून को गोविंदघाट पहुंचते ही मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। वे हेमकुंड साहिब जाने का साहस नहीं जुटा पाए।
हर 10 साल बाद दिखेगा बारिश से तबाही का मंजर
इसी रात अलकनंदा नदी का जलस्तर बढ़ गया। रात को गोविंदघाट में बदरीनाथ हाईवे की चोटी पर चढ़ गए। 17 जून को भी भूखे-प्यासे जंगल में ही रहे। यहां करीब पांच सौ स्थानीय लोग भी आए।
स्थानीय लोगों की बिस्कुट खाकर रात बिताई। 18 को सेना के हेलीकॉप्टर तो दिखे, लेकिन हमें बचाने कोई नहीं पहुंचा। हमने आस छोड़ दी थी।
केदारनाथः आंखों से छलका दर्द
लेकिन 19 जून की सुबह सेना के जवान देवदूत बनकर पहुचे तो जान में जान आई और उन्होंने हमें बचा लिया।