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तेलंगाना राज्यः अब तक का सफरनामा

Tue, 30 Jul 2013 09:32 PM IST
कृष्ण कुमार सिंह
कृष्ण कुमार सिंह Updated Tue, 30 Jul 2013 09:32 PM IST
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telangana how become state

आखिरकार अलग तेलंगाना राज्य बनाने पर केंद्र सरकार ने मुहर लगा दी है। यह देश का 29वां राज्य होगा।

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अलग तेलंगाना को लेकर वहां के लोगों ने लंबा संघर्ष किया। राजनीतिक रस्साकशी की वजह से तेलंगाना मसला कई सालों तक लटका रहा। हालांकि सरकार को जनता के आगे झुकना पड़ा।

एक नजर तेलंगाना राज्य के सपने से हकीकत बनने के सफर पर।

पढ़ें, तेलंगाना गठन को मंजूरी, हैदराबाद होगी संयुक्त राजधानी
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इन्होंने दी आंदोलन को धार
1956 में तेलंगाना क्षेत्र को भाषा के आधार पर पहले राज्य बने आंध्र प्रदेश में मिला दिया गया। तब पहली बार कामरेड वासुपुन्यया ने अलग तेलंगाना राज्य की मांग उठाई थी।
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1969 में तेलंगाना प्रजाराज्यम पार्टी के चेन्ना रेड्डी ने जय तेलंगाना का नारा देकर इस आंदोलन को शक्ति प्रदान की लेकिन जल्द ही उन्होंने इससे खुद को अलग कर लिया। तब कमान संभाली टीआरएस के नेता के. चंद्रशेखर राव ने।

तेलंगाना के 10 जिले
- अदिलाबाद, करीमनगर, खम्मम, महबूबनगर, मेडक, नालगोंडा, निजामाबाद, रंगारेड्डी, वारंगल और हैदराबाद।

पढ़ें, तेलंगाना राज्य: कैसी होगी गठन की प्रक्रिया?

शुरू हुई राजनीति
2001 में चंद्रशेखर राव ने अपनी अलग पार्टी तेलंगाना राष्ट्र समिति की स्थापना की। वर्ष 2004 में आम चुनाव को देखते हुए तेलंगाना राज्य के गठन को लेकर के. चंद्रशेखर राव ने कांग्रेस से हाथ मिलाया और लोकसभा चुनाव में टीआरएस को पांच सीटें मिली।

हालांकि केंद्र में केंद्र सरकार के गठन के वाबजूद सरकार द्वारा तेलंगाना मुद्दे को ठंडे वस्ते में डालने से नाराज टीआरएस प्रमुख चंद्रशेखर राव 2006 में यूपीए गठबंधन से अलग हो गए।

2009 के लोकसभा और विधानसभा चुनाव में टीआरएस ने कांग्रेस से अलग टीडीपी के साथ मिलकर चुनाव लड़ा। हालांकि इस बार टीआरएस के दो सांसद ही लोकसभा पहुंच पाए।

पढ़ें, लोकसभा चुनाव में तेलंगाना भी नहीं होगा कांग्रेस का तारणहार

आम चुनाव 2014 को सामने आते देख एक बार फिर तेलंगाना की मांग जोर पकड़ रही थी। इसलिए 28 दिसंबर, 2012 को केंद्र सरकार ने पृथक तेलंगाना राज्य के गठन को लेकर नई दिल्ली में सर्वदलीय बैठक बुलाई। इसके बाद केंद्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने कहा कि सरकार जल्द ही कोई फैसला लेगी।

गृह मंत्रालय द्वारा बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में आंध्र प्रदेश के सभी आठ प्रमुख दल कांग्रेस, भाजपा, टीआरएस, टीडीपी, माकपा, भाकपा, एमआईएम और वाईएसआर कांग्रेस के सदस्यों ने हिस्सा लिया।

चंद्रशेखर राव ने छेड़ा आंदोलन
दिसंबर 2009 की शुरुआत में के. चंद्रशेखर राव आमरण अनशन पर बैठ गए। 6 दिसंबर को अलग राज्य की मांग को लेकर टीआरएस के 48 घंटों के बंद के दौरान कई जगह पुलिस से झड़पें हुई। आंदोलन समूचे प्रदेश में फैल गया।

चंद्रशेखर राव के आमरण अनशन और आंदोलन के बढ़ते दायरे के दवाब के कारण केंद्र सरकार को 9 दिसंबर 2009 को अलग राज्य के लिए प्रक्रिया शुरू करने की घोषणा करनी पड़ी। इसके बाद चंद्रशेखर राव ने अपना अनशन खत्म कर दिया।

समर्थन और विरोध की राजनीति

15 दिसंबर, 2009 को आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री वाईएसआर के बेटे और कांग्रेस सांसद जगनमोहन रेड्डी ने अपनी चुप्पी तोड़ते हुए अखंड आंध्र की वकालत की और संसद में तेदेपा के विरोध-प्रदर्शन में शामिल हो गए।

इससे लोकसभा में कांग्रेस के लिए फजीहत वाली स्थिति पैदा हो गई क्योंकि केंद्र सरकार अलग तेलंगाना की घोषणा कर चुकी थी।

अखंड आंध्र की वकालत करते हुए अगले दिन पृथक तेलंगाना के विरोध में प्रजाराज्यम पार्टी के नेता चिरंजीवी ने इस्तीफा दे दिया।

26 दिसंबर, 2009 को जेएसी ने केंद्र को अलग राज्य के गठन की समयसीमा के ऐलान के लिए चार दिन का अल्टीमेटम देते हुए फिर से आंदोलन शुरू करने की चेतावनी दे डाली।

इसके बाद 31 दिसंबर 2009 को तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम को सफाई देनी पड़ी कि तेलंगाना मामले पर कोई टालमटोल नहीं हुआ।

8 जनवरी, 2010 को नई दिल्ली में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, तत्कालीन वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी, तत्कालीन गृह मंत्री पी चिदंबरम, तत्कालीन कानून मंत्री एम वीरप्पा मोइली ने नई दिल्ली में अहम बैठक की।

प्रदर्शन हुआ हिंसक
19 जनवरी 2010 को उस्मानिया यूनिवर्सिटी में एक छात्र ने पृथक तेलगांना को लेकर खुदकुशी कर ली जिसके बाद प्रदर्शन ने हिंसक रूप धारण कर लिया। छात्र अगले दिन शव को लेकर सड़क पर उतर गए वहीं पुलिस आंदोलन को कुचलने के लिए नक्सल विरोधी फोर्स तक तैनात कर दिया।


परिणाम भयावह निकला और दोनों ओर से जमकर झड़प हुई जिसमें 30 छात्र और ।5 पुलिसकर्मी घायल हो गए।

वहीं राज्य के गठन की मांग के पक्ष में ।29 विधायकों ने इस्तीफा दे दिया। हालांकि विधानसभा अध्यक्ष ने इन सभी विधायकों के इस्तीफे नामंजूर कर दिए।

आंध्र प्रदेश में आंदोलन चरम पर था तो उधर दिल्ली में 22 फरवरी, 20।0 को तेलंगाना क्षेत्र के करीब 200 प्रदर्शनकारी पुलिस को चकमा देते हुए संसद भवन के बेहद करीब पहुंच गए, जिससे वहीं अफरातफरी मच गई।

जुलाई 2011 में एक बार फिर से तुलंगाना मुद्दे ने जोड़ पकड़ा और तेलंगाना क्षेत्र के 119 विधायकों में 101 इस्तीफा दे दिया। इसमें सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी के 12 मंत्री भी शामिल थे। आंध्र प्रदेश विधानसभा में 294 विधायक हैं।

श्रीकृष्णा समिति का गठन

केंद्र सरकार ने 3 फरवरी 2010 को अलग राज्य पर विचार करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश बीएन श्रीकृष्णा की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय विशेषज्ञ समिति का गठन किया।

कमेटी को पृथक राज्य के गठन के साथ ही अखंड आंध्र की मौजूदा स्थिति बरकरार रखने के बारे में भी विचार करनी थी। श्रीकृष्ण समिति ने अपनी रिपोर्ट केंद्र सरकार को 30 दिसंबर को सौंप दी जिसे 6 जनवरी, 2011 सार्वजनिक की गई।

श्रीकृष्णा समिति की सिफारिशें
--यथास्थिति बनाए रखी जाए। हालांकि अभी के हालात को देखते हुए यथास्थिति बनाए रखना राजनीतिक रूप से व्यावहारिक नहीं है।

--आंध्रप्रदेश को सीमांध्र और तेलंगाना में बांट दिया जाए और हैदराबाद को केंद्र शासित प्रदेश बना दिया जाए।
राज्य को रायल तेलंगाना और तटीय आंध्र क्षेत्र में बांट दिया जाए। हैदराबाद को रायल तेलंगाना में शामिल कर दिया जाए।

--राज्य को सीमांध्र और तेलंगाना में बांट दिया जाए और वृहत हैदराबाद को केंद्र शासित राज्य बना दिया जाए।
वर्तमान में जो भौगोलिक सीमा है उसी के हिसाब से सीमांध्र और तेलंगाना राज्य का निर्माण किया जाए।

--आंध्र को नहीं बांटने की सिफारिश। तेलंगाना क्षेत्र के विकास के लिए अलग से तेलंगाना क्षेत्रीय विकास परिषद की स्थापना का सुझाव।

तेलंकाना के अलावा अन्य राज्यों की मांगः-

उत्तर प्रदेशः हरित प्रदेश, बुंदेलखंड व पूर्वांचल
महाराष्ट्रः विदर्भ
पश्चिम बंगालः गोरखालैंड, कूच बिहार
असमः बोडोलैंड
बिहारः मिथिलांचल
राजस्थानः मरु प्रदेश
कर्नाटकः कुर्ग
अन्यः सौराष्ट्र, मालवा, गोंडवाना, सोनांचल, महाकौशल, कोंकण और कामतापुर की मांग।

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