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कुछ अलग हैं प्रणब दा, सात माह में फांसी पर दो फैसले
नई दिल्ली/ब्यूरो
Updated Sun, 10 Feb 2013 08:11 PM IST
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रायसीना हिल्स पहुंचने के बाद से ही राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने सात माह के भीतर फांसी को लेकर दो बड़े फैसले कर दिए हैं। पहले अजमल कसाब और अब अफजल गुरू की दया याचिका को नांमजूर कर उन्हें फांसी के फंदे तक पहुंचाने की राह आसान कर प्रणब दा ने साबित कर दिया है कि वे अपने पूर्ववर्ती राष्ट्रपतियों से हटकर चलने में विश्वास रखते हैं।
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राष्ट्रपति के रुख से माना जा रहा है कि वे आगे भी बड़े फैसले कर सकते हैं। राष्ट्रपति के नाम से पहले ‘महामहिम’ शब्द के इस्तेमाल पर रोक लगाने और राष्ट्रपति भवन का दरवाजा आम लोगों के लिए खोल देने वाले प्रणब दा इन फैसलों भी संकेत दे चुके हैं कि वे जनता की नब्ज को जानते हैं।
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दूसरी ओर पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम और प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने कई दुर्दांत आतंकियों की फांसी संबंधी फाइलों पर फैसला लेने से बचते रहे। पाटिल ने तो बलात्कार के दोषी की फांसी को सजा को उम्र कैद में बदल दिया था।
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संसद पर आतंकी हमलों के दोषी अफजल गुरू को विशेष अदालत से मिली फांसी की सजा को सर्वोच्च न्यायालय ने भी 2004 में बरकरार रखा था, लेकिन तब से मामला आगे नहीं बढ़ पाया। तब से डॉ.कलाम और प्रतिभा पाटिल राष्ट्रपति भवन में रहे।
मुंबई आतंकी हमलों के दोषी पाकिस्तानी आतंकी अजमल कसाब की मिली फांसी की सजा पर अमल करने का मामला भी पाटिल के कार्यकाल में फाइलों में दबा रहा। लेकिन प्रणब दा रायसीना हिल्स पहुंचने के पहले तो मात्र चार माह के भीतर कसाब की दया याचिका खारिज कर दी, इसके बाद उसे फांसी देने का रास्ता साफ हो गया था।
अब अफजल गुरू की दया याचिका को नामंजूर कर एक दशक से ज्यादा समय से चल रहे मामले को अंतिम परिणति तक पहुंचा दिया।