आरक्षण आंदोलन: बदले गुजरात के सियासी समीकरण
गुजरात में पटेल आंदोलन राज्य सरकार के साथ विपक्षी कांग्रेस के लिए भी एक बड़ी चुनौती है। दरअसल इस आंदोलन ने सूबे में पिछले 25 सालों से चले आ रहे राजनीतिक समीकरण को पूरी तरह बदल दिया है। राज्य की राजनीति में बिल्कुल नए चेहरों का उदय हुआ है, जो किसी दल से नहीं आते।
अहम बात है कि गुजरात के सबसे ताकतवर समुदायों में से एक पटेल अब किसी भाजपाई या कांग्रेसी नहीं बल्कि अपने इन्हीं युवा नेताओं के नेतृत्व में खड़े हैं। ये तीन युवा हैं हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकुर और लालजी पटेल।
देश ने पिछले कुछ हफ्तों में एक चेहरे को बहुत तेजी से उभरते देखा है। वह हैं पटेल आंदोलन की अगुवाई कर रहे 22 वर्षीय हार्दिक पटेल। हार्दिक ने पूरे आंदोलन को बहुत ही आक्रामक तेवर दिया है।
उनके साथ अन्य पिछड़ा जाति के युवा नेता अल्पेश ठाकुर और सरदार पटेल ग्रुप के नेता लालजी पटेल ने भी बदलते परिदृश्य में तेजी से अपनी जगह बनाई है।
परंपरागत राजनीति को चुनौती
गुजरात में पटेलों का खासा दबदबा है और यह समुदाय भाजपा का धुर समर्थक माना जाता था लेकिन अब हालात बदल गए हैं। यही समुदाय अब हार्दिक और लालजी के आह्वान पर सरकार तथा पार्टी के लिए मुश्किलें खड़ी कर रहा है।
पटेल परंपरागत राजनीतिक दलों से कितनी तेजी से दूर हुए हैं, इसे इस बात से समझ सकते हैं कि समुदाय ने अपने गांवों में नेताओं के आने पर प्रतिबंध लगा दिया है।
लोगों से कहा जा रहा है कि वे आगामी चुनाव में नोटा का इस्तेमाल करें। हार्दिक पहले ही कह चुके हैं कि भाजपा के लिए आने वाले चुनाव मुश्किल साबित होंगे। तीसरे युवा नेता अल्पेश ओबीसी की कमान थामे हुए हैं।
उन्होंने कह दिया है कि यदि पटेल समुदाय को ओबीसी कोटे में जगह दी गई तो वे सरकार को कार्यकाल पूरा नहीं करने देंगे। जाहिर है कि सरकार यदि पटेलों की सुनती है तो ओबीसी वर्ग नाराज होगा और अगर नहीं सुनती है तो आंदोलन झेलना पड़ेगा।
वहीं कांग्रेस की मुश्किल यह है कि वह भाजपा का विरोध होते हुए देख रही है पर खुद विरोध नहीं कर पा रही। फिलहाल इन दोनों दलों के पास नए नेताओं की कोई काट नहीं है।