{"_id":"28760","slug":"national-28760","type":"story","status":"publish","title_hn":"याद आया 1969 में 'गूंगी गुड़िया' का खेल","category":{"title":"India News Archives","title_hn":"इंडिया न्यूज़ आर्काइव","slug":"india-news-archives"}}
याद आया 1969 में 'गूंगी गुड़िया' का खेल
विनीता वशिष्ठ
Updated Mon, 18 Jun 2012 12:00 PM IST
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देश के 13वें राष्ट्रपति के चुनाव का परिदृश्य लगभग साफ हो गया है। डा. एपीजे अब्दुल कलाम की 'ना' के साथ ही प्रणब मुखर्जी के राष्ट्रपति बनने का रास्ता साफ हो गया है। देश में अब तक जितने भी राष्ट्रपति चुनाव हुए हैं उनमें 1969 के चुनाव को सबसे रोचक, यादगार और असाधारण माना जाता है। उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपनी कूटनीतिक दक्षता का परिचय देते हुए रातोंरात राजनीतिक समीकरण बदल डाले। नतीजा ये हुआ कि कांग्रेस अपने ही प्रत्याशी को हरा बैठी और पीएम की पसंद के प्रत्याशी को जीत हासिल हुई।
दूसरे नजरिए से देखा जाए तो ये इंदिरा गांधी बनाम कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के बीच ऐसा कूटनीतिक चुनाव था जिसमें इंदिरा की कांग्रेस पर जीत हुई। कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं में 'गूंगी गुड़िया' कही जाने वाली इंदिरा गांधी ने एक अपील से अपनी ही पार्टी के प्रत्याशी को हरवा दिया। वो इतिहास के सबसे विवादित और रोचक राष्ट्रपति चुनाव थे जब मतदान से महज कुछ घंटों पहले राजनीतिक समीकरण एकाएक बदल गए।
गूंगी गुड़िया बनाम सिंडिकेट
यूं तो इंदिरा गांधी ने 1966 में प्रधानमंत्री पद संभाला लेकिन उनकी ताकत 1969 में देखने को मिली। उस समय कांग्रेस के सीनियर नेताओं की चौकड़ी यानी कांग्रेस सिंडिकेट का कांग्रेस पर एकछत्र राज था। सिंडिकेट में कांग्रेस अध्यक्ष के.कामराज, मोरारजी देसाई, नीलम संजीवा रेड्डी, एस.निजलिंगप्पा और एस.के.पाटिल जैसे दिग्गज शामिल थे। दरअसल सिंडिकेट ने इंदिरा को पीएम इसलिए ही बनाया था कि वो उनके इशारों पर काम करती रहे। लेकिन इंदिरा के मन में कुछ और था।
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जब महत्वाकांक्षी ने जोर मारा
सिंडिकेट का मानना था कि इंदिरा में राजनीतिक समझ और फैसले लेने की दक्षता नहीं है। इसी के चलते सिंडिकेट कई अहम फैसले बिना उन्हें भरोसे में लिए करती रही। लेकिन ये गूंगी गुड़िया दो सालों में ही समझ गई कि सिंडिकेट को पराजित किए बिना उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा पूरी नहीं हो सकती। ऐसा मौका उन्हें 1969 में राष्ट्रपति चुनाव के दौरान मिला। इस मौके का इंदिरा ने फायदा उठाया और सिंडिकेट को करारा जवाब भी दिया।
भारी पड़ा नजरंदाज करना
1969 के चुनावों में कांग्रेस सिंडिकेट ने अपने ही एक सदस्य और उपराष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी को उम्मीदवार घोषित किया। इस संबंध में इंदिरा से रायशुमारी तक न की गई। इंदिरा चुप रही लेकिन उनके दिमाग में खेल चल रहा था। उस समय रेड्डी के खिलाफ निर्दलीय के तौर पर वी वी गिरि ने परचा भरा। राष्ट्रपति डॉ.जाकिर हुसैन के निधन के बाद उपराष्ट्रपति वी.वी.गिरि कार्यवाहक राष्ट्रपति की भूमिका में थे। इंदिरा के सहयोग से वे राष्ट्रपति चुनाव में उतरने को तैयार हो गए।
रात दस बजे - अन्तरात्मा की आवाज
दरअसल इंदिरा सिंडिकेट की आंख में तो खटकती थी लेकिन जूनियर नेताओं और सांसद-विधायकों की वे चहेती थी। इंदिरा ने रात साढ़े दस बजे जूनियर नेताओं और कांग्रेसी विधायकों को टेलीफोन करके आह्वान किया कि वे अपनी अंतरात्मा की आवाज पर वोट दें। इसका साफ मतलब था कि इंदिरा रेड्डी की बजाय निर्दलीय उम्मीदवार वी.वी.गिरि को समर्थन देने की बात कर रही थी। अपनी प्रधानमंत्री की अपील पर पूरी कांग्रेस ने मन बदला। इतनी रात को हुए इस घटनाक्रम पर सिंडिकेट कुछ न कर पाई क्योंकि समय ही नहीं था। दूसरे दिन संसद में कड़ी प्रतिस्पर्धा में इंदिरा की अपील काम आई और निर्दलीय प्रत्याशी गिरि ने सिंडिकेट के प्रत्याशी रेड्डी को हरा दिया। वी वी गिरि की जीत दरअसल इंदिरा गांधी की सिंडिकेट पर जीत थी। तभी से कांग्रेस में इंदिरा का उदय और सिंडिकेट का पतन होना शुरू हो गया।
कांटे का मुकाबला
दरअसल रेड्डी और गिरि के बीच कांटे का मुकाबला था। एक तरफ कांग्रेस के सीनियर नेताओं की सिंडिकेट थी तो दूसरी तरफ जूनियर नेता और कांग्रेसी विधायक। प्रथम वरीयता के मतों की गिनती में किसी को बहुमत नहीं मिला। वी वी गिरि को 4,01,515 मत मिले जो बहुमत से 16,645 मत कम थे। नीलम संजीव रेड्डी को प्रथम वरीयता के 3,13,548 मत मिले। ऐसी स्थिति में दूसरी वरीयता के मतों की गिनती हुई।
दूसरी वरीयता के मतों ने बनाया खेल
उन चुनावों की सबसे खास बात ये थी कि गिरि ने दूसरी वरीयता यानी विधायकों के मतों के आधार पर जीत पाई। उन्होंने दूसरी वरीयता के मतों के आधार पर 14,650 मतों के अंतर से रेड्डी को हराया था। हालांकि ये अंतर भी भारतीय राष्ट्रपति चुनाव में जीत का सबसे कम अंतर था लेकिन जीत तो जीत होती है। संविधान में राष्ट्रपति के चुनाव के संदर्भ में ऐसा प्रावधान है कि बहुमत के लिए जरूरी मत प्राप्त नहीं होने पर दूसरी वरीयता के मतों के आधार पर निर्णय होता है।
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दूसरे नजरिए से देखा जाए तो ये इंदिरा गांधी बनाम कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के बीच ऐसा कूटनीतिक चुनाव था जिसमें इंदिरा की कांग्रेस पर जीत हुई। कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं में 'गूंगी गुड़िया' कही जाने वाली इंदिरा गांधी ने एक अपील से अपनी ही पार्टी के प्रत्याशी को हरवा दिया। वो इतिहास के सबसे विवादित और रोचक राष्ट्रपति चुनाव थे जब मतदान से महज कुछ घंटों पहले राजनीतिक समीकरण एकाएक बदल गए।
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गूंगी गुड़िया बनाम सिंडिकेट
यूं तो इंदिरा गांधी ने 1966 में प्रधानमंत्री पद संभाला लेकिन उनकी ताकत 1969 में देखने को मिली। उस समय कांग्रेस के सीनियर नेताओं की चौकड़ी यानी कांग्रेस सिंडिकेट का कांग्रेस पर एकछत्र राज था। सिंडिकेट में कांग्रेस अध्यक्ष के.कामराज, मोरारजी देसाई, नीलम संजीवा रेड्डी, एस.निजलिंगप्पा और एस.के.पाटिल जैसे दिग्गज शामिल थे। दरअसल सिंडिकेट ने इंदिरा को पीएम इसलिए ही बनाया था कि वो उनके इशारों पर काम करती रहे। लेकिन इंदिरा के मन में कुछ और था।
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जब महत्वाकांक्षी ने जोर मारा
सिंडिकेट का मानना था कि इंदिरा में राजनीतिक समझ और फैसले लेने की दक्षता नहीं है। इसी के चलते सिंडिकेट कई अहम फैसले बिना उन्हें भरोसे में लिए करती रही। लेकिन ये गूंगी गुड़िया दो सालों में ही समझ गई कि सिंडिकेट को पराजित किए बिना उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा पूरी नहीं हो सकती। ऐसा मौका उन्हें 1969 में राष्ट्रपति चुनाव के दौरान मिला। इस मौके का इंदिरा ने फायदा उठाया और सिंडिकेट को करारा जवाब भी दिया।
भारी पड़ा नजरंदाज करना
1969 के चुनावों में कांग्रेस सिंडिकेट ने अपने ही एक सदस्य और उपराष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी को उम्मीदवार घोषित किया। इस संबंध में इंदिरा से रायशुमारी तक न की गई। इंदिरा चुप रही लेकिन उनके दिमाग में खेल चल रहा था। उस समय रेड्डी के खिलाफ निर्दलीय के तौर पर वी वी गिरि ने परचा भरा। राष्ट्रपति डॉ.जाकिर हुसैन के निधन के बाद उपराष्ट्रपति वी.वी.गिरि कार्यवाहक राष्ट्रपति की भूमिका में थे। इंदिरा के सहयोग से वे राष्ट्रपति चुनाव में उतरने को तैयार हो गए।
रात दस बजे - अन्तरात्मा की आवाज
दरअसल इंदिरा सिंडिकेट की आंख में तो खटकती थी लेकिन जूनियर नेताओं और सांसद-विधायकों की वे चहेती थी। इंदिरा ने रात साढ़े दस बजे जूनियर नेताओं और कांग्रेसी विधायकों को टेलीफोन करके आह्वान किया कि वे अपनी अंतरात्मा की आवाज पर वोट दें। इसका साफ मतलब था कि इंदिरा रेड्डी की बजाय निर्दलीय उम्मीदवार वी.वी.गिरि को समर्थन देने की बात कर रही थी। अपनी प्रधानमंत्री की अपील पर पूरी कांग्रेस ने मन बदला। इतनी रात को हुए इस घटनाक्रम पर सिंडिकेट कुछ न कर पाई क्योंकि समय ही नहीं था। दूसरे दिन संसद में कड़ी प्रतिस्पर्धा में इंदिरा की अपील काम आई और निर्दलीय प्रत्याशी गिरि ने सिंडिकेट के प्रत्याशी रेड्डी को हरा दिया। वी वी गिरि की जीत दरअसल इंदिरा गांधी की सिंडिकेट पर जीत थी। तभी से कांग्रेस में इंदिरा का उदय और सिंडिकेट का पतन होना शुरू हो गया।
कांटे का मुकाबला
दरअसल रेड्डी और गिरि के बीच कांटे का मुकाबला था। एक तरफ कांग्रेस के सीनियर नेताओं की सिंडिकेट थी तो दूसरी तरफ जूनियर नेता और कांग्रेसी विधायक। प्रथम वरीयता के मतों की गिनती में किसी को बहुमत नहीं मिला। वी वी गिरि को 4,01,515 मत मिले जो बहुमत से 16,645 मत कम थे। नीलम संजीव रेड्डी को प्रथम वरीयता के 3,13,548 मत मिले। ऐसी स्थिति में दूसरी वरीयता के मतों की गिनती हुई।
दूसरी वरीयता के मतों ने बनाया खेल
उन चुनावों की सबसे खास बात ये थी कि गिरि ने दूसरी वरीयता यानी विधायकों के मतों के आधार पर जीत पाई। उन्होंने दूसरी वरीयता के मतों के आधार पर 14,650 मतों के अंतर से रेड्डी को हराया था। हालांकि ये अंतर भी भारतीय राष्ट्रपति चुनाव में जीत का सबसे कम अंतर था लेकिन जीत तो जीत होती है। संविधान में राष्ट्रपति के चुनाव के संदर्भ में ऐसा प्रावधान है कि बहुमत के लिए जरूरी मत प्राप्त नहीं होने पर दूसरी वरीयता के मतों के आधार पर निर्णय होता है।