बेनूर हो चुका है 'कलाईनार'
बुद्धि और भाषा कौशल में ये किशोर हर तरह के उत्तम था लेकिन उस समय तमिलनाडु में घोर रूप से व्याप्त वर्गीय भेदभाव ने उसे संगीत स्कूल में लंगोट के ऊपर का कपड़ा नहीं पहनने दिया।
1937 में जब स्कूलों में हिंदी की अनिवार्यता लागू की गई तो करुणा द्रविड आंदोलन में कूद पड़े। इस किशोर ने बसों, रेलवे स्टेशनों, दुकानों और भोजनालयों तक पर लिखे हिंदी के नाम मिटा डाले।
करुणा की हिंदी के प्रति खिलाफत पेरियार की नजर में आ चुकी थी। हिंदी की खिलाफत करते करते करुणा मानों संगीत स्कूल में अपने साथ हुए भेदभाव की भड़ास निकाल रहे थे।
पेरियार की सरपरस्ती
कौन जानता था कि द्रविड़ आंदोलन के दौरान तमिलनाडु की सड़कों और रेलवे स्टेशनों पर हिंदी के नाम मिटाता ये लड़का एक दिन तमिलनाडु की राजनीति का पैरोकार साबित होगा।
दसवीं में फेल होते ही करुणा कोयटंबूर की तरफ भागे और हस्तलिखित पत्रिकाओं में पटकथा लिखने लगे। नाटक कहानी और कविताएं करने के साथ साथ करुणा एक शानदार वक्ता थे और यही हुनर उनके काम आ गया।
दरअसल पेरियार की नजर बहुत पहले से इस अनगढ़ पत्थर पर थी, जिसे उन्होंने 1937 के द्रविड़ आंदोलन के दौरान इसे देखा और समझा था। उन्होंने और सीएन अन्नादुराई ने करुणा को हिंदी विरोधी जनसभाओँ में भाषण देने के लिए उत्साहित किया।
अपने भाषणों पर ताली बजाती भीड़ देख करुणा और जोश से बोलते। उनके समर्थक
उन्हें प्यार से कलाईनार (कला का विद्वान) कहते थे। बाद में करुणा ने
कलाईनार के नाम से अपना केबल टीवी नेटवर्क भी स्थापित किया। पेरियार समझ
चुके थे कि अब लड़का पार्टी में शामिल होने के लिए तैयार है। हिंदी विरोधी मिशन की सफलता के बाद पेरियार ने करुणा को अपनी द्रविड़ कजगम पार्टी की पत्रिका का संपादक बना दिया।
अन्नादुराई का साथ और डीएमके
आजादी के बाद पेरियार और अन्नादुराई की जोड़ी टूटने का सबसे बडा फायदा करुणा को मिला और उन्होंने अन्नादुराई का साथ देते हुए उनकी पार्टी डीएमके में अहम जगह बना ली।
1957 में हुए चुनावों में डीएमके के खाते में 11 सीटें आई लेकिन करुणा के तमिल आत्मसम्मान और हिंदी विरोध की लहर ऐसी चली कि 1967 में डीएमके ने राज्य में पहली गैर कांग्रेसी सरकार बना ली।
इसके बाद दो बातें हुई, कांग्रेस खुद कभी अपने पर इस द्रविड़ राज्य में सरकार नहीं बना पाई और दूसरी तरफ डीएमके से अलग हुए एमजीआर की पार्टी मजबूत हो रही थी।
अम्मा की चुनौती
इसे करुणा की बेफिक्री कहिए या कमी, उन्होंने एमजीआर के लगातार मजबूत होते अस्तित्व पर तब तक ध्यान नहीं दिया जब तक 1977 में हुए चुनाव में एआईडीएमके ने डीएमके को करारी हार नहीं दी।
सबसे खास बात ये रही कि एमजीआर के जीवित रहने तक करुणा सत्ता में वापसी नहीं कर सके। अम्मा यानी जयललिता से करुणा का बैर छिपा हुआ नहीं है।
एमजीआर की मौत के बाद जया के पार्टी संभालने पर करुणा ने कहा - एक ब्राह्रण औरत जिसे द्रविड़ जीवन की जानकारी तक नहीं है, किस तरह द्रविड़नाडु में मेरे लिए चुनौती कैसे बन सकती है। लेकिन ये एक सोच थी जिसे जया ने गलत साबित कर दिया।
जया के तमिलनाडु में बढ़ते राजनीतिक कद से करुणा इस कदर झल्लाने लगे कि अपनी ओजस्वी वाकपुटता जिसने उन्हें सत्ता दिलाई, उसे ही नजरंदाज कर बैठे।
विधानसभा या हस्तिनापुर?
25 मार्च 1989 को तमिल विधानसभा में करुणा का जया के प्रति उग्र और कथित अपमानजक व्यवहार उन्हें द्रविड़ हीरो से विलेन बना गया।
बजट पेश करते वक्त एआईडीएम के विधायकों का हस्तक्षेप करुणा को इस कदर नागवार गुजरा कि माइक पर उन्होंने जया के खिलाफ अपमानजनक और असंसदीय शब्दों की बौछार कर दी।
बात यहीं तक खत्म नहीं हुई, सदन से बाहर जाते हुए डीएमके के लोक निर्माणमंत्री दुराई मुरुगन ने जया के साथ हाथापाई करते हुए उनकी खींच कर फाड़ दी।
तमिलनाडु विधानसभा में हुए इस कथित चीरहरण कांड ने करुणा की छवि तो बेहाल कर ही दी, डीएमके के राजनीतिक पतन की पहली कील भी ठोक दी।
1991 में राजीव गांधी हत्याकांड करुणा के लिए बुरा दौर साबित हुआ। लिट्टे को प्रोत्साहित करने की एवज में केंद्र सरकार ने करुणा की सरकार गिरा दी और उसी साल हुए चुनावों में डीएमके मात्र सात सीटों पर सिमट गई।
एक ब्राह्मण औरत जो द्रविड़ जीवन के बारे में कुछ नहीं जानती थी, 224 सीटों पर काबिज हो गई।
ब्लैकमेल की राजनीति
बाद के दो दशक कभी अम्मा तो कभी करुणा सत्ता पर काबिज होते रहे। करुणानिधि जब विपक्ष में बैठते तो उन पर घोटालों की गाज गिरती, जांच बिठाई जाती, वारंट जारी होते। लेकिन सत्ता में आते ही फैसले उलट जाते। पिछले 22 सालों में केंद्र में बनी हर सरकार में डीएमके या फिर एआईडीएमके शामिल रही है।
इसे करुणा की सियासी सोच कहिए कि केंद्र में रही कांग्रेस की सरकार को उन्होंने जी भर कर ब्लैकमेल किया है। केंद्र को ब्लैकमेल करने की क्षेत्रीय दलों की ये ट्रिक करुणा की पोटली से निकली है।
''आप चिंता न करें, हो जाएगा''
याद होगा आपको मार्च 2007, का दिन। करुणा के एक फोन पर यूपीए अध्यक्ष दौड़ी दौड़ी चेन्नई पहुंचती है, साथ में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और दो पूर्व प्रधानमंत्री भी है। मौका है बतौर विधायक करुणा की पचासवीं सालगिरह का।
मंच पर अपने बगल की कुर्सी पर बैठी सोनिया के कान में करुणा फुसफुसाते हैं और सोनिया जवाब में कहती है - आप चिंता न करें, हो जाएगा। नतीजा, दयानिधि मारन कैबिनेट से बाहर।
बाहर करुणा कुछ भी कहें लेकिन वो मारन बंधुओं को अपने बेटों के बीच नफरत पैदा करने का जिम्मेदार मान रहे थे।
कलानिधि मारन के स्वामित्व वाले सन टीवी द्वारा कराए गए उसी सर्वे ये नफरत पैदा हुई जिसके तहत 80 फीसदी लोग स्टालिन को करुणा के उत्तराधिकारी के तौर पर पसंद करते हैं। सर्वे के बाद अलागिरी पिता से नाराज हो बैठा और स्टालिन के प्रति जलन महसूस करने लगा।
करुणा ने बाकायदा कहा भी कि मारन भाइयों ने जानबूझकर ये सर्वे कराया ताकि उनके परिवार में अस्थिरता पैदा हो सके। सन टीवी के बंटवारे और शेयर के विवाद के चलते भी करुणा मारन बंधुओं को पसंद नहीं करते।
इधर कुंआ उधर खाई...
2जी मामले में खुद तक पहुंचती सीबीआई की जांच की आंच और दूसरी ओर दिल्ली से बढ़ती दूरी। ऐसे में परंपरागत वोटर भी हाथ से निकल रहा है। ये सारी विडंबनाएं एक एक करके नब्बे साल के इस सूरमा को परेशां किए हुए हैं।
साठ साल के राजनीतिक जीवन में अपनी विधानसभा सीटों पर कभी हार का मुंह न देखने वाला ये सूरमा विधानसभा चुनावों में करारी हार और वर्तमान में हो रही फजीहत से इस कदर परेशान है कि अक्सर अपने ही कार्यकर्ताओं पर झल्ला जाता है।
हिंदी से नफरत लेकिन हिंदी भाषी सरकार से...
हिंदी से करुणानिधि को जाहिर तौर पर खासा बैर रहा है। 2002 में एक विवादित बयान के तहत उन्होंने हिंदुओं को चोर तक कह डाला था। लेकिन सियासत के खेल में यही करुणानिधि केंद्र में हिंदी भाषी सरकार के साथ बैठने में कोई परहेज नहीं करते।
इसे शायद बढ़ती उम्र और कम होती याद्दाश्त का असर कहा जाए, कभी अपने ही मुख्यमंत्रित्व काल में राम और सेतुसमुद्रम के आस्तित्व को स्वीकार करने वाले करुणा बाद में इससे मुकर गए।
कुल मिलाकर करुणानिधि राजनीतिक महाभारत के ऐसे भीष्म पितामह हैं जो अपनी आंखों के सामने अपने साम्राज्य का पतन देखने को मजबूर है।
लेकिन इतनी सारी मुसीबतों के बीच राहत की बात ये है कि करुणानिधि के उत्तराधिकारी स्टालिन की डीएमके में अच्छी पैठ है और स्टालिन सुलझी राह पर चले तो डीएमके का अस्तित्व बचा बचा रह सकता है।