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क्या 1967 के जॉर्ज हैं केजरीवाल?

Thu, 05 Feb 2015 10:02 PM IST
सुदीप ठाकुर/अमर उजाला, दिल्ली
सुदीप ठाकुर/अमर उजाला, दिल्ली Updated Thu, 05 Feb 2015 10:02 PM IST
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is aap chief arvind kejriwal being george fernandes

वर्ष 1967 में देश के चौथे लोकसभा के चुनाव हुए थे और उस चुनाव में जिन चुनिंदा सीटों पर देशभर की नजर थी, उसमें दक्षिण मुंबई की सीट भी थी, जहां कांग्रेस के दिग्गज एस के पाटील को 37 वर्षीय युवा मजदूर नेता जॉर्ज फर्नांडीज चुनौती दे रहे थे।

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देश की आर्थिक राजधानी कहे जाने वाले इस संसदीय क्षेत्र की ताकत के बारे में कहने की जरूरत नहीं है। लेकिन इस चुनाव में फर्नांडीज ने पाटील को पटखनी दे दी और तब ब्लिट्ज अखबार ने सुर्खी बनाई थी, 'जॉर्ज द जाइंट किलर'! उसके बाद से भारतीय चुनावों के संदर्भ में जाइंट किलर जुमले का न जाने कितनी बार प्रयोग किया गया है।
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अक्टूबर, 2013 में जब दिल्ली विधानसभा के चुनाव में नई दिल्ली सीट से अरविंद केजरीवाल ने तीन बार की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को पराजित किया था, तब भी उनकी जीत की तुलना फर्नांडीज के उस चुनाव से की गई थी। केजरीवाल और फर्नांडीज की तुलना एक बार फिर शुरू हो गई है, लेकिन इस बार आम आदमी पार्टी के नेता के सामने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को रखा जा सकता है।

वास्तव में 1960-70 के दशक के जॉर्ज फर्नांडीज और अरविंद केजरीवाल को देखें, तो दोनों में कई समानताएं नजर आती हैं। बावजूद इसके कि उन दोनों में सबसे बड़ा फर्क उनकी पृष्ठभूमि को लेकर देखा जा सकता है। सुदूर मंगलोर के खांटी ईसाई परिवार से ताल्लुक रखने वाले फर्नांडीज के पिता उन्हें बचपन में पादरी बनाना चाहते थे। लेकिन चर्च से विद्रोह कर 18-19 वर्ष की उम्र में 1949 की किसी शाम उन्होंने मंगलोर से मुंबई की ट्रेन पकड़ ली थी। और अगले दो दशक में उन्होंने कुछ छोटी मोटी नौकरियों से लेकर टाइम्स ऑफ इंडिया में अस्थायी नौकरी तक की और साथ ही श्रमिकों और टैक्सी ड्राइवरों को संगठित करते रहे और बड़े श्रमिक नेता बनकर उभरे।

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दूसरी ओर दिल्ली से सटे हरियाणा के एक कस्बे से निकले केजरीवाल ने आईआईटी से पढ़ाई की है और आईआरएस अधिकारी भी रहे हैं। लेकिन यदि बिखरे बाल, तुड़ा-मुड़ा कुर्ता पायजामा और चप्पलें जॉर्ज फर्नांडीज की पहचान रही है, तो बेफिक्री से पहनी गई ढीली ढाली कमीज और पतलून, मफलर, लाल-नीले स्वेटर के साथ ही फ्लोटर अरविंद केजरीवाल की पहचान है। लहजा भले अलग हो, दोनों के भाषण देने की शैली में समानताएं तलाशी जा सकती हैं। और व्यवस्था से टकराने में अल्ट्रा लेफ्ट जैसी आक्रामकता।

इस सबसे बड़ी बात यह है कि फर्नांडीज की तरह केजरीवाल चट्टान से टकराने का हौसला रखते हैं, भले ही उसमें पराजित क्यों न हो जाएं। दोनों के चुनाव लड़ने का तरीका भी कमोबेश एक जैसा है। 'अराजकता' दोनों की राजनीतिक शैली का हिस्सा कही जा सकती है, भले ही आप उससे सहमत हों या न हों। इस पर भी बहस हो सकती है कि अराजक होने का मतलब क्या है? यही नहीं, श्रमिक आंदोलनों की फर्नांडीज की शैली और केजरीवाल की सीधे सड़क पर धरना प्रदर्शन की शैली भी एक जैसी लगती है।

सबसे बड़ी बात यह है कि उनके मुकाबले बड़ी ताकतें रही हैं।

दिवंगत मृणाल गोरे और हिम्मत भाई झावेरी जैसे जॉर्ज के कुछ पुराने साथी उनके इस चुनाव को बड़ी शिद्दत से याद करते थे। अंधेरी के उनके फ्लैट में, जहां मुंबई के शुरुआती दिनों में जॉर्ज भी उनके साथ रहे थे, हिम्मत भाई ने कोई एक दशक पहले इस चुनाव के बारे में कहा था, “यह ऐसा था मानो आप किसी बड़ी सी चट्टान को धक्का देना चाहते हों।“ उन्होंने याद किया कि तब फर्नांडीज ने मराठी में नारा दिया था, “पाटील पढलेच पाहिजेत, तुम्ही याना पाडु सकता।“ यानी पाटील को पराजित किया जा सकता है और आप उसे पराजित कर सकते हैं।

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नतीजे जब आए तो दक्षिण मुंबई के लोग उस चट्टान को धक्का दे चुके थे। इतनी बड़ी जीत हासिल करने के बाद स्वाभाविक रूप से जॉर्ज फर्नांडीज एक बड़े नेता बनकर उभरे।


1974 की रेल हड़ताल और आपातकाल में उनकी गिरफ्तारी और फिर जेल से ही 1977 में बिहार के मुजफ्फरपुर से चुनाव जीतना यह सब भारत के समकालीन राजनीतिक इतिहास का हिस्सा बन चुका है। लेकिन एक बड़ा सच यह भी है कि 1967 के चुनाव के बाद फर्नांडीज फिर कभी मुंबई से चुनाव नहीं जीत सके। यह कहना मुश्किल है कि केजरीवाल ने कभी जॉर्ज फर्नांडीज की राजनीति से कुछ सीखने की जरूरत महसूस की या नहीं, क्योंकि राजनीतिक पटल में उनके आने से पहले फर्नांडीज राजनीति के नेपथ्य में चले गए।

अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी के साथ एनडीए का हिस्सा रहे फर्नांडीज नरेंद्र मोदी और अमित शाह का भी साथ देते यह कहना मुश्किल है। लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि पिछले कुछ वर्षों से गंभीर बीमारी से जूझ रहे जॉर्ज फर्नांडीज यदि स्वस्थ्य होते तो अरविंद केजरीवाल की राजनीति को कुतूहल से देख रहे होते।

लाख टके का सवाल है कि क्या केजरीवाल दिल्ली में मोदी और शाह नामक बड़ी चट्टान को धक्का दे पाएंगे? इस सवाल का जवाब पाने के लिए हमें दस फरवरी तक इंतजार करना होगा। यदि उन्हें दिल्ली में बहुमत नहीं भी मिलता है, तो भी उन्होंने देश की राजनीति को बदल दिया है, वरना लोकसभा चुनाव के बाद देश एक ध्रुवीय राजनीति की ओर बढ़ता दिख रहा था।

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