नेपाल में नया संविधानः कूटनीतिक पहल करने में नाकाम रहा भारत
लंबे संघर्ष और अराजकता भरे दौर से गुजरने के बाद रविवार को नेपाल ने नए संविधान को जन्म तो दे दिया, मगर भारत इस मामले में अपने कूटनीतिक हित साधने में नाकाम रहा।
वह भी तब जब अंतिम समय में हालात को संभालने के लिए खुद विदेश सचिव एस जयशंकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विशेष दूत के तौर पर काठमांडू में मौजूद थे। कहा जा रहा है कि भारत ने कूटनीतिक पहल करने में देर कर दी।
बताते हैं कि शुक्रवार को ही नेपाल पहुंचे जयशंकर ने खासतौर से मधेसियों को संविधान में उचित स्थान न मिलता देख संविधान पारित करने के कार्य को कुछ दिनों के लिए टालने का सुझाव दिया था।
हालांकि जयशंकर नेपाल सरकार से बाद में संविधान संशोधन के जरिए मधेसियों की मांगों पर विचार का महज आश्वासन ही पा सके। कहा जा रहा है कि चीन के करीबी माओवादी नेता और पूर्व प्रधानमंत्री पुष्प कुमार दहल ‘प्रचंड’ ने भारत के अरमानों पर पानी फेर दिया।
भारत ने नेपाल में कूटनीतिक पहल करने में कर दी देर
विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत ने कूटनीतिक पहल करने में देर कर दी। सरकार को उसी समय इस मामले में कूटनीतिक मोर्चे पर जुट जाना चाहिए था, जब नेपाल के शीर्ष 4 दलों ने 8 जून को अपने सारे मतभेद भुला कर हर हाल में संविधान निर्माण पर प्रतिबद्धता जताई थी।
चूंकि नए संविधान के लिए दो तिहाई बहुमत अनिवार्य था, इसलिए भारत की मधेसियों के प्रति चिंता से सहमति रखने वाले दल भी इस मामले में कोई मदद नहीं कर सके।
इसके साथ ही यह पहली बार हुआ जब नेपाल की किसी बड़ी घटना में भारत अंत समय तक न तो महत्वपूर्ण योगदान निभा पाया और न ही उसे हमेशा से मिलता आ रहा महत्व ही मिला।
भारत की बड़ी राजनीति चूक
नेपाल पर गहरी दृष्टि रखने वाले मेजर जनरल अशोक मेहता (रिटायर्ड) इसे भारत की बड़ी राजनीतिक चूक मानते हैं। मेहता कहते हैं सारी जानकारी होने के बावजूद भारत की ओर से कूटनीतिक पहल में देर कर दी गई।
जब हाथ से सारा कुछ निकल गया था, तब विदेश सचिव को अचानक नेपाल भेजा गया। इसलिए भारत अपने रुख से पहली बारे नेपाल को सहमत नहीं करा पाया।