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'अलीगढ़' का रिक्शा वाला बोला, डर के मारे प्रोफेसर से बनाए संबंध

Tue, 01 Mar 2016 03:45 PM IST
Updated Tue, 01 Mar 2016 03:45 PM IST
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अपनी मौत के बाद चर्चा में आए एएमयू के प्रो. रामचंद्र सिरास के समलैंगिक संबंधों का स्टिंग ऑपरेशन करने वाले आदिल मुर्तजा ने कहा है कि फिल्म में जो दिखाया है और जो हकीकत में कहानी है, उसमें जमीन और आसमान का अंतर है। आदिल के साथ वह रिक्शा वाला भी लखनऊ में है, जिसके साथ समलैंगिक संबंधों को फिल्म में दिखाया गया है। इस मामले में वह अदालत का दरवाजा खटखटाने की तैयारी में हैं।

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रिक्शा वाले का कहना है कि प्रो. सिरास उसे लगातार संबंध बनाने के लिए धमकाते थे। न मानने पर बर्बाद करने की धमकी देते थे। साथ ही पैसों और मदद का लालच देते थे। इसी जाल से मुक्ति पाने के लिए उसने स्टिंग ऑपरेशन करने वालों की मदद ली थी, जिससे वह दुनिया के सामने अपनी बात को प्रमाण सहित रख सके। लेकिन फिल्म में दिखाया है कि संबंध मेरी सहमति से बन रहे हैं।
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इसके अलावा आदिल मुर्तजा ने कहा कि फिल्म में दिखाया है कि हमने प्रो. सिरास के डंडा मार दिया, जबकि हकीकत में हमने ऐसा कुछ नहीं किया था। फिल्म में हमारी भूमिका को ऐसा दिखाया है कि जैसे हमने ही प्रो. सिरास की हत्या की है।

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चुप्पी साध लेते हैं दुर्गाबाड़ी के लोग

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गौरतलब है कि सन 2010 में एएमयू के लिंग्विस्टक डिपार्टमेंट के प्रो. सिरास समलैंगिक संबंध स्थापित करने के कारण चर्चा में आए थे। इस प्रकरण के कुछ ही दिनों बाद उनका शव उनके उस मकान में मिला था, जिसमें वह किराए पर रह रहे थे। इस प्रकरण में अभी भी अलीगढ़ में मुकदमा विचाराधीन है।

प्रो. सिरास के जीवन और समलैंगिक प्रकरण पर फिल्मकार हंसल मेहता ने ‘अलीगढ़’ नाम से फिल्म का निर्माण किया है, जिसका अलीगढ़ मुसलिम विश्वविद्यालय और शहर, दोनों जगहों पर कुछ संगठन विरोध कर रहे हैं।

समलैंगिक संबंध के लिए चर्चा में आए एएमयू के प्रो. सिरास के जीवन पर बनी फिल्म ‘अलीगढ़’ को लेकर उठे विवाद के बाद उनका आखिरी मुकाम रहे मोहल्ला दुर्गाबाड़ी के लोग प्रो. सिरास का नाम लेने पर चुप्पी साध लेते हैं। दुर्गाबाड़ी में प्रो. सिरास जिस घर में किराए पर रहते थे वह ‘बंद गली का आखिरी मकान’ (यही धर्मवीर भारती की लोकप्रिय किताब भी है) है। शायद ही उन्हेें (प्रो. सिरास को) अहसास हुआ होगा कि यही उनके जीवन का भी आखिरी मुकाम भी साबित होगा। इसी मकान में उनकी मौत के कई दिन बाद उनका शव मिला था।

जीवन भी एक पहेली की तरह था
प्रो. सिरास मूल रूप से महाराष्ट्र के रहने वाले थे, लेकिन परिवार से उनका कोई लेना देना नहीं था। यहां तक कि मौत के बाद उनकी पत्नी यहां नहीं आई थीं। करीब तीन दशकों से वह अलीगढ़ में अकेले ही रह रहे थे। प्रो. सिरास से परिवार की बेरुखी इस बात से समझी जा सकती है कि उनकी मौत के छह साल बाद भी उनके फंड आदि का पैसा लेने भी कोई नहीं आया है। (तस्वीर में दुर्गाबाड़ी)

पूरे प्रदेश में प्रतिबंध लगाने की मांग उठी

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मिल्लत बेदारी मुहिम कमेटी की ओर से फिल्म ‘अलीगढ़’ को पूरे प्रदेश में प्रतिबंधित करने की मांग उठी है। प्रदेश के मुख्यमंत्री को भेजे पत्र में कहा है कि यूपी पूरे प्रदेश का दिल कहलाता है। साथ ही यहां की संस्कृति एवं सभ्यता न देश-विदेश में भी चर्चित है।

फिल्म समलैंगिकता पर आधारित है जो कि हमारे समाज में अमान्य है तथा हमारी संस्कृति के विपरीत है। फिल्म का नाम न केवल अलीगढ़ शहर की छवि को धूमिल करता है बल्कि एक ऐसा नकारात्मक संदेश देता है जिससे अलीगढ़ के साथ प्रदेश की छवि भी खराब होती है। हंसल मेहता की फि ल्म से ऐसा प्रतीत होता है जैसे अलीगढ़ समलैंगिकता का केन्द्र है।

फिल्म एएमयू के प्रो. श्रीनिवास रामचंद्र सिरास के जीवन और समलैंगिक संबंधों पर आधारित है इसलिए एएमयू की छवि पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

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