खोजः बायो-ईंधन उद्योग को मिलेगी रफ्तार, गन्ने से तैयार होगा बायो फ्यूल
बायो-ईंधन उद्योग को रफ्तार देने के लिए वैज्ञानिकों ने उत्पादन का एक नया तरीका खोज निकाला है। वैज्ञानिकों के मुताबिक ग्रीन रिफाइनरीज को गन्ने व गन्ने की खोई की नई तकनीक का इस्तेमाल करते हुए व्यावसायिक उत्पादन करने की जरूरत है।
ये उत्पाद वर्तमान में इस्तेमाल होने वाले ईंधन से सस्ते और गुणवत्ता वाले बताए गए, जिनमें लुब्रिकेंट भी शामिल हैं। लॉरेंस बर्कले नेशनल लैबोरेटरी और बर्कले की यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के शोधकर्ताओं ने इस नई तकनीक के बारे में ‘प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंस जर्नल’ में विस्तार से जानकारी दी है।
बायो ईंधन इसलिए बेहतर
हार्वर्ड केनेडी स्कूल में राजनीतिक अर्थशास्त्र के प्रोफेसर जेम्स स्टॉक द्वारा लिखे कोलंबिया सेंटर ऑन ग्लोबल एनर्जी पॉलिसी रिपोर्ट के मुताबिक ‘वर्तमान में पहली पीढ़ी के बायो-ईंधन कच्चे माल के बतौर मुख्यत: खाद्य फसलों के इस्तेमाल से बनते हैं जो या तो खर्चीले हैं अथवा पेट्रोलियम ईंधन की तुलना में ग्रीनहाउस गैस के मामले में मामूली रूप से ही बेहतर होते हैं। कम ग्रीन हाउस गैस वाले दूसरी पीढ़ी के बायो-ईंधन का विकास और व्यवसायीकरण, इस योजना की सफलता के लिए महत्वपूर्ण हैं।’
कई वर्ष लग सकते हैं इस काम में
बायो-ईंधन उद्योग लिए शोधकर्ता दुबारा विज्ञान का सहारा ले रहे हैं ताकि ज्यादा सक्षम तकनीक के जरिये अखाद्य फसलों और गन्ने की खोई जैसे अपशिष्ट पदार्थों से इसे तैयार किया जा सके।
बायो-ईंधन उद्योग को इस काम में वर्षों लग सकते हैं क्योंकि पहली पीढ़ी के इथेनॉल से परिष्कृत बायो फ्यूल का मार्ग प्रशस्त हुआ है जिसका उत्पादन ज्यादा सक्षम प्रक्रियाओं से किया जा रहा है।
‘‘गन्ना आधारित बायोरिफाइनरीज आज इथेनॉल, चीनी और बिजली का उत्पादन करते हैं। अगर उत्पादों का विस्तार कर जेट फ्यूल और लुबिक्रेंट ऑयल तथा बायोडीजल बनाया जाए तो परिचालकों को अपनी कीमत और जोखिम के प्रबंधन में मदद मिल सकती है।’’
-अमित गोखले, बर्कले टीम के प्रमुख शोधकर्ता