फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   Entertainment Archives ›   secret behind sadashiv amrapurkar

ये रहे सदाशिव अमरापुरकर के कुछ अनकहे रहस्य

Mon, 03 Nov 2014 05:27 PM IST
Updated Mon, 03 Nov 2014 05:27 PM IST
विज्ञापन
secret behind sadashiv amrapurkar
फिल्म सड़क में महारानी का किरदार इसकी रिलीज से पहले ही चर्चित होने लगा था। जानिए फिल्म की मेकिंग के दौरान खुद सदाशिव अमरापुरकर का क्या कहना था इस रोल के बारे में...
विज्ञापन


वह खुद बताते हैं "ये जो किरदार है, अनोखा है। आधा मर्द है, आधा औरत है। यह कोठे चलाने वाला इंसान है। एक तरफ उसे औरतों जैसा रहन-सहन उसे अच्छा लगता है। कभी-कभी वह कोठे वाली औरतों को बुला कर उनके हाथों से साड़ी पहन कर, तैयार होकर अपनी फोटो खिंचाता है। दूसरी तरफ बात यह भी है कि वह औरतों की तरह दिखता नहीं है, उनके जैसी खूबसूरती और नजाकत उसके पास नहीं है।
विज्ञापन


ऐसे में वह औरतों से नफरत भी करता है। ठीक वैसे जैसे वह मर्दों से नफरत करता है। उसके साथ-साथ फिल्म में उसका भविष्य भी फिल्म में दिखाया गया है। दरवाजे पर एक बूढ़ा आदमी जो सदा कोठे के दरवाजे पर बैठा रहता है। कभी वह इस कोठे को चलाया करता था। यह आदमी उसे खिलाता है, पिलाता है और उसका ध्यान रखता है। वह जानता है कि मेरा भी भविष्य यही होने वाला है।
विज्ञापन
विज्ञापन


ये है तो विलेन, लेकिन इसे एक स्त्री का शेड दिया गया है। इस तरह का किरदार मैंने बहुत साल पहले कॉलेज में एक मराठी नाटक में किया था। जिसमें मैं एक गंधर्व के रोल में था। पुराने जमाने में मराठी में थियेटर में महिलाओं के किरदार पुरुष निभाते थे। यह ऐसे ही व्यक्ति की कहानी थी। इसलिए महारानी का रोल मेरे लिए कोई नया चैलेंज नहीं है।

हां, इसके मन की उमड़-घुमड़ कमाल है। यह मर्द भी है और औरत भी लेकिन उसे किस रोल में लोगों सामने आना चाहिए, इसके लिए वह टॉस करता है। उसके पास देवी का एक मुकुट है, जिसके सामने वह टॉस करके तय करता है कि उसे स्त्री के रूप में रहना चाहिए या पुरुष के रूप में। अपने अन्य फैसले भी वह टॉस करके लेता है। सिर्फ ऐसा नहीं कह सकते कि यह एक पुरुष ऐक्टर द्वारा निभाया स्त्री का कैरेक्टर है। असल में यह काफी जटिल है।

धर्मेंद्र मानते थे अपने लिए ‘लकी’

secret behind sadashiv amrapurkar

फिल्मों में यूं तो हीरो-हीरोइन की जोड़ी हुआ करती है, लेकिन कई बार हीरो और विलेन भी पर्दे पर एक-दूसरे के साथ खूब जमते हैं। ऐसा ही कुछ मामला धर्मेंद्र और सदाशिव अमरापुरकर का था।

वैसे तो सदाशिव ने कैरियर उन दिनों में शुरू किया जब धर्मेंद्र शिखर को पार कर चुके थे, लेकिन धर्मेंद्र को उनका अंदाज इतना पसंद आया कि सदाशिव अपने अपोजिट उनके पसंदीदा विलेन हो गए। जानकार कहते हैं कि धर्मेंद्र उन्हें अपने लिए ‘लकी’ मानने लगे थे।

यही कारण है कि सदाशिव अमरापुरकर उनके साथ दो-चार नहीं बल्कि ग्यारह फिल्मों में नजर आए। दोनों ने संग में जो फिल्में की उनमें शामिल हैः रिटर्न ऑफ ज्वैलथीफ (1996), फूलन हसीना रामकली (1993), कोहराम (1991), दुश्मन देवता (1991), फरिश्ते (1991), वीरू दादा (1990), नाकाबंदी (1990), ऐलान-ए-जंग (1989), पाप को जला कर राख कर दूंगा (1988), खतरों के खिलाड़ी (1988), हुकूमत (1987)।

बने इंस्पेक्टर, रोल मिला विलेन का

secret behind sadashiv amrapurkar

स्कूल और कॉलेज के दिनों से अभिनय से पहला प्यार रखने वाले सदाशिव अमरापुर को फिल्मों में पहला मौका निर्देशक गोविंद निहलानी ने अर्द्धसत्य में दिया। वह इंडियन नेशनल थियेटर से जुड़े थे और इसी संस्था के एक नाटक ‘हैंड्स अप’ में इंस्पेक्टर की भूमिका निभा रहे थे।

यहीं निहलानी ने उन्हें देखा और अपनी फिल्म के लिए रोल ऑफर किया। सदाशिव अमरापुर को लगा था कि निहलानी उन्हें इंस्पैक्टर की भूमिका देंगे, लेकिन यहां उन्हें मिला विलेन का रोल। निहलानी ने उन्हें अंडरवर्ल्ड के डॉन का रोल दिए।

उन्होंने यह रोल इसने प्रभावपूर्ण ढंग से निभाया कि फिर पीछे मुड़ कर नहीं देखा। अर्द्धसत्य के लिए उन्हें फिल्म फेयर द्वारा सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का अवार्ड दिया गया। इसके बाद सदाशिव अमरापुरकर लगातार आगे बढ़ते गए। उन्होंने अपने कैरियर में 300 से ज्यादा हिंदी, मराठी, बंगाली, उड़िया और हरियाणवी फिल्मों में काम किया।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed