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मुकेश की इन यादों को सजों कर रख लीजिए

Wed, 27 Aug 2014 02:47 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला दिल्ली
टीम डिजिटल/अमर उजाला दिल्ली Updated Wed, 27 Aug 2014 02:47 PM IST
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 Remembering the legendary singer Mukesh

गायक मुकेश को समझने के लिए उनकी जिंदगी से जुड़ी यह छोटी-छोटी बातें बड़ी अहम लगती हैं। आज मुकेश की पुण्यतिथि है।

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उन दिनों राजेश खन्ना के स्टारडम का दौर सिमटने लगा था। एक तरह से कहिए, उनके स्टारडम का रथ अस्ताचल की ओर बढ़ रहा था, लेकिन बच्चों के लिए तो वह सुपरस्टार ही थे। उस समय भी अगर घर में इतना भर ही कह दिया कि राजेश खन्ना की पिक्चर लगी है, तो टिकट के लिए आसानी से पैसे मिल जाते थे। कोई रोकटोक नहीं होती थी।

कई बार तो घर में झूठ भी बोल दिया कि राजेश खन्ना की फिल्म लगी है। दरअसल राजेश खन्ना की फिल्म का जिक्र कर देने से बच्चों को फिल्म देखने की अनुमति मिल जाती थी। उस समय राजेश खन्ना की कई फिल्में देखीं। इन फिल्मों के गीतों का भी अपना खासा लुत्फ था। पर इनमें किशोर बहुत पॉपुलर हो गए थे। मुकेश और किशोर के अंतर को तब हम  इतना क्या महसूस कर पाते, लेकिन किशोर के गीत हर तरफ छाए रहते थे।  
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वह महज किशोर और राजेश खन्ना का ही दौर न था, देवानंद की "हरे रामा हरे कृष्णा"और" जानी मेरा नाम"के गाने भी रसिक यहां-वहां गुनगुनाया करते थे।"पल भर के लिए कोई हमें प्यार कर ले""फूलों का तारों का""कांची रे कांची रे"जैसे गीतों का अपना समा था।
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राजकपूर की बॉबी के "झूठ बोले कव्वा काटे""अंखियों को रहनेदे" जैसे गीतों की बहार थी। फिजा में रफी साहब का ऊंचा आलाप लिया गीत भी गूंजता था,"ओ आज मौसम बड़ा। "इन गीतों के क्रम और वर्षों में कुछ फर्क लग सकता है। लेकिन तब पापुलर गीत आज की तरह  केवल  हफ्ते दो हफ्ते के लिएनहीं होते थे। गीत के पॉपुलर होने के बाद उसे लंबे समय तक सुना जाता था।इन गीतों की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि उनमें समय का अंतर महसूस नहीं होता था।
    
स्टेज पर ऐसे दिखते थे मुकेश

जिन्होंने मुकेश के स्टेज शो को देखा है, वे बताते हैं कि वे खुद हारमोनियम बजाते हुए केवल ढोलक या तबले के सहारे आधी-आधी रात तक अपने कार्यक्रम देते थे। मैंने पुराने एलबमों में मुकेश को स्वयं हारमोनियम के साथ गाते हुए देखा है। साथ में बस चार-पांच साजिंदे और कभी-कभी युगल गीतों के लिए कोई गायिका। उस दौर में मुकेश या रफी के कार्यक्रम का मतलब यही होता होगा कि उनके गीतों को ही सुनना।

गाना लोकप्रिय होगा ही

एक बार कल्याणजी ने कहा था कि मुकेश जी से गीत गवाने का मतलब था कि गीत लोकप्रिय होगा ही, फिल्म भले चले या ना चले। बात ठीक ही थी। "देखती ही रहो आज दर्पण ना तुम "वो तेरे प्यार का गम""सारंगा तेरी याद में" "जाने कहां गए वो दिन""सजनवा बैरी हो गए हमार" ना जाने ऐसे कितने तराने हैं जिन्हें सुनकर लगता है कि फिल्म भरपूर सफल हुई होगी। शायद इसलिए कि इन फिल्मों के गीत बहुत हिट हुए।

फिल्म चाहे जिस करवट बैठी हो,लेकिन उन्होंने गाया तो गीत हिट ही हुए। वे उस दिन को भी याद करते रहे जब मुकेश ने "कोई जब तुम्हारा हृदय तोड़ दे" गीत के लिए चालीस से ज्यादा रिटेक लिए थे। शाम तीन बजे से रिकॉर्डिंग शुरू होने पर सुबह पांच बजे तक गीत रिकार्ड हो पाया। एक बार उनसे कहा भी कि आपने अच्छा गाया है, लेकिन वे नहीं माने। वह बार बार गाते रहे और साज भी बजते रहे।  था, वो इस गीत-संगीत में महसूस होता है।
 
बेटे से सुनायी कुछ यादें
   
अपने पिता के बारे में बहुत सी बातें की थीं नितिन मुकेश ने।उन्होंने बताया था, "वह सुबह सुबह उठ कर रामचरित मानस  जरूर पढ़ा करते थे"। उन्होंने उस दिन को भी याद किया, जब चंद्रशेखर ने  इंग्लैंड केखिलाफ शानदार गेंदबाजी की थी।

मैच खत्म होने के बाद उन्होंने फोन करके कहा था कि वह मिलने आ रहे हैं। हमने उन्हें बताया तो कहने लगे, अरे वो क्रिकेट खेल रहे हैं , भला कैसे आ पाएंगे।  यू हीं कह दिया होगा। पर चंद्रशेखर घर पर आए थे। मुकेश ने तब उनसे कहा कि "भई सारी दुनिया तो आपके पीछे है, आप यहां कैसे आ गए"।


चंद्रा का जवाब था, "मुकेशजी आप कहते हैं कि सारी दुनिया मेरे पीछे, लेकिन  मैं आपके पीछे।" प्रसंगवश नितिन मुकेशकई घटनाएं ऐसी बताते चले गए थे। तब यही महसूस हुआ कि जिस तरह मुकेश गाते थे, उसके लिए जिंदगी भी उतनी ही साफ-सुथरी होनी चाहिए।

(वेद विलास उनियाल की पुस्तक 'सुन मेरे बंधु' का अंश)

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