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अब क्लास न चलीं तो कुलपति साहब होंगे जिम्मेदार
आशीष त्रिवेदी/अमर उजाला, लखनऊ
Updated Wed, 19 Mar 2014 09:31 AM IST
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अब नए सत्र में स्टूडेंट्स को क्लास बंक करना महंगा पड़ेगा। उनकी 75 प्रतिशत उपस्थिति की नियमित निगरानी की जाएगी। यही नहीं शिक्षकों को भी अपनी रेग्युलर क्लास का ब्योरा देना होगा।
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शिक्षकों का पैनल विश्वविद्यालयों के सभी विभागों और डिग्री कॉलेजों का औचक निरीक्षण करेगा। उच्च शिक्षा में गुणवत्ता कितनी बढ़ी है इसे लेकर हर तीन महीने पर समीक्षा बैठक होगी।
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कक्षाएं नियमित चलें इसे लेकर विश्वविद्यालय के कुलपति और निदेशक उच्च शिक्षा की जवाबदेही होगी। वह उच्च शिक्षा विभाग की इस कवायद को विश्वविद्यालय और डिग्री कॉलेजों में बेहतर ढंग से लागू करवाएंगे।
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राज्य विश्वविद्यालयों और डिग्री कॉलेजों में शिक्षा के स्तर में सुधार को लेकर सत्र की शुरुआत में ही शैक्षिक कैलेंडर घोषित करना होगा। अभी विश्वविद्यालय व डिग्री कॉलेजों में यह शैक्षिक कैलेंडर सिर्फ रस्म-अदायगी बनकर रह गया है।
बीते वर्षों में खुद लखनऊ विश्वविद्यालय ने ही अपना शैक्षिक कैलेंडर दिसम्बर में घोषित किया था। वहीं डिग्री कॉलेजों में तो शैक्षिक कैलेंडर की कोई मॉनिटरिंग ही नहीं होती।
अब साल भर की शैक्षणिक गतिविधियों का कैलेंडर यूनिवर्सिटी को घोषित करना होगा। इसी कैलेंडर के अनुसार ही शैक्षिक गतिविधियां भी संचालित की जाएंगी।
अगर ऐसा न हुआ तो इस पर कुलपति और निदेशक उच्च शिक्षा से जवाब मांगा जाएगा। प्रमुख सचिव उच्च शिक्षा नीरज गुप्ता की ओर से सभी यूनिवर्सिटीज, सहायता प्राप्त और अनुदानित डिग्री कॉलेजों को पत्र लिखकर शैक्षिक कैलेंडर तैयार करने को कहा गया है।
लगातार बढ़ रही प्राइवेट यूनिवर्सिटीज और कंप्टीशन को देखते हुए स्टेट यूनिवर्सिटीज और कॉलेजों के स्टूडेंट्स के व्यक्तित्व के समग्र विकास पर जोर दिया जा रहा है।
राज्य सरकार ने बीते दिनों विश्वविद्यालयों की परिनियमावली में जो बदलाव यूजीसी की सलाह पर किए हैं उसमें कम से कम छह घंटे प्रतिदिन शिक्षकों को कैंपस में देना ही होगा।
अब शैक्षिक कैलेंडर को बेहतर ढंग से लागू करवाकर उच्च शिक्षा को बेहतर बनाने की कोशिश की जा रही है। जिसमें विश्वविद्यालयों के शैक्षिक कैलेंडर, प्रवेश प्रक्रिया, कक्षाओं का संचालन, छात्रों की उपस्थिति, परीक्षाओं के आयोजन सहित परीक्षा परिणाम जैसी गतिविधियों में सुधार लाना जरूरी है।
शैक्षिक कैलेंडर के अनुसार अध्ययन-अध्यापन कार्य न होने के पीछे कुलपति और निदेशक उच्च शिक्षा की जवाबदेही तय की जाएगी। इसके साथ ही कक्षाओं के संचालन को लेकर समय-सारिणी बनाने को कहा गया है।
समय-सारिणी के मुताबिक शिक्षकों को छात्रों की 75 फीसदी न्यूनतम उपस्थिति दर्ज करना होगा। विशेष परिस्थितियों में कुलपति अपने अधिकार से 15 फीसदी की छूट उपस्थिति में दे सकते हैं।
वहीं परिसर में शैक्षिक कार्यों की गुणवत्ता के लिए कुलपति अपने स्तर से तीन वरिष्ठ शिक्षकों का पैनल गठित करेंगे। यह पैनल विश्वविद्यालयों के संकायों सहित विभागों और कॉलेजों का आकस्मिक निरीक्षण कर कुलपति को रिपोर्ट देगी।
इसके साथ ही गुणवत्ता, दक्षता और समयबद्धता को लेकर एक त्रैमासिक प्रतिवेदन प्रणाली विकसित की जाएगी। जिसकी समीक्षा कुलपति और निदेशक उच्च शिक्षा अपने-अपने स्तर से करेंगे। इसकी रिपोर्ट शासन को भी भेजी जाएगी।