अब सॉफ्टवेयर पकड़ लेगा पीएचडी में आपकी 'चोरी'
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उत्तराखंड में गढ़वाल विवि ने रिसर्च चोरी रोकने और इसका स्तर बनाने के लिए एक सॉफ्टवेयर खरीदा है। यह सॉफ्टवेयर खुद ही थिसिस का मिलान करता है। 168 कर्मचारियों के नियमितीकरण के मामले पर कोई फैसला नहीं हो पाया।
शनिवार को देहरादून के राजपुर रोड स्थित एक होटल में आयोजित बैठक में वरिष्ठ आमंत्रित सदस्य प्रो. एसके जोशी ने शोध के गिरते स्तर पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि कई संस्थान ऐसे हैं, जहां पीएचडी एक सामान्य कोर्स की तरह हो गई है। युवाओं को जमकर पीएचडी की डिग्रियां बांटी जा रही हैं।
इस पर विवि प्रशासन ने जानकारी दी कि उनके पास मौजूद सॉफ्टवेयर इस रिसर्च के स्तर को बढ़ाने में काफी कारगर है। वह हर शोधार्थी से थिसिस की सॉफ्ट कॉपी मंगाते हैं। इसे उस सॉफ्टवेयर में डाला जाता है।
सॉफ्टवेयर खुद ही इसका मिलान करता है। अगर 30 प्रतिशत तक किसी पहले से मौजूद थिसिस से मिलान होता है तो पीएचडी आगे बढ़ाई जाती है। अगर इससे ज्यादा का मिलान किसी दूसरी थिसिस से होता है तो उसे रिजेक्ट कर दिया जाता है। बैठक में सभी सदस्यों ने विवि के इन प्रयासों की सराहना की।
पांच को मिली राहत, 168 का इंतजार बरकरार
गढ़वाल विवि की कार्यकारी परिषद की छठी बैठक भी कर्मचारियों के लिए निराशाजनक रही। विवि में 168 कर्मचारी ऐसे हैं, जो 32, 28, 25, 20, 17, 16 या 15 साल से कार्यरत हैं, लेकिन नियमित नहीं हैं। वर्ष 2009 में केंद्रीय विवि बनने के बाद से लगातार इनके नियमितीकरण की मांग की जा रही है।
ईसी की बैठक में भी इस पर चर्चा हुई और सभी सदस्य कर्मचारियों के हक में नजर आए, लेकिन कानूनी पेचीदगी की वजह से मामले का कोई हल नहीं निकाला जा सका। दूसरी ओर, वर्ष 2013 में सामने आए शिक्षकों के प्रमोशन इंटरव्यू में शून्य अंक दिए जाने के मामले में राहत मिली है।
एक सदस्य ने कहा कि किसी भी शिक्षक को सुप्रीम कोर्ट के नियमानुसार सात से कम अंक नहीं दिए जा सकते हैं। इसलिए शिक्षकों को दोबारा इंटरव्यू में बैठने का मौका दिए जाने पर मुहर लगी।