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'कम नहीं हुआ शिमला समझौते का महत्व'

Mon, 12 May 2014 10:59 PM IST
ब्यूरो/ अमर उजाला, शिमला
ब्यूरो/ अमर उजाला, शिमला Updated Mon, 12 May 2014 10:59 PM IST
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seminar on the occasion of Shimla Agreement

हिमाचल प्रदेश यूनिवर्सिटी में सोमवार को शिमला समझौता 1914 के 100 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में संगोष्ठी आयोजित की गई। यूनिवर्सिटी के राजनीतिक विज्ञान विभाग और तिब्बत नीति निर्माण संस्थान धर्मशाला के संयुक्त तत्वावधान में हुई संगोष्ठी में समझौते के वर्तमान परिदृश्य में मंथन किया गया।

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कुलपति प्रो. एडीएन वाजपेयी ने कहा कि शिमला समझौता 1914 का महत्व आज भी कम नहीं हुआ है। चीन ने भले ही 1914 के इस समझौते पर हस्ताक्षर न किए हों, मगर वह भी इसकी अनदेखी नहीं कर सकता। उन्होंने कहा कि आज हमें सीमा निर्धारण को लेकर समझौते पर विश्व स्तर पर जनमत बनाना होगा।
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किसी राष्ट्र का किसी दूसरे राष्ट्र के अधीन होना न्यायसंगत नहीं है। ब्रिटेन ने तिब्बत को लेकर 2008 में जो अपनी राय जाहिर की, उसके कारणों पर भी मंथन करना होगा। यह वही ब्रिटेन है, जो 1914 में समझौते में भागीदार था। ब्रिटेन और चीन के मौजूदा संबंधों को समझना होगा। आज चीन का आईएमएफ और वर्ल्ड बैंक में प्रभाव बढ़ा है।
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तिब्बत और चीन के साथ भारत का सीधा संबंध है। भारत के अरुणाचल और तिब्बत की स्थिति एक जैसी ही है।  मुख्य वक्ता के रूप में शरीक हुए जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय नई दिल्ली के प्रो. स्वर्ण सिंह और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के प्रो. आरएस यादव ने समझौते के हर पहलू को उजागर किया। उन्होंने बताया कि किन परिस्थितियों में यह समझौता हुआ। किस तरह चीन ने इस पर हस्ताक्षर करने से इनकार किया।

भारत ने 2008 में इस समझौते को मानने से इनकार कर दिया। वहीं ब्रिटेन ने 2008 में इस समझौते को मानने से इनकार कर दिया। उन्होंने इस समझौते के महत्व पर प्रकाश डाला और चीन और ब्रिटेन के रवैये के बदलाव के कारणों को बताया। सत्र में तिब्बत की निर्वासित सरकार के तिब्बत नीति निर्माण संस्थान में वरिष्ठ शोधकर्ता थंडूप गैल्पो, लोबसांग तैम्पा और तेजिंग नौरगे ने अपने अपने पत्र पढ़े।

समन्वयक डॉ. कमल मनोहर शर्मा ने कहा कि इस समझौते के अनुसार प्रदेश के जनजातीय  जिलों के साथ लगती अंतर्राष्ट्रीय सीमा से व्यापारिक गतिविधियों के साथ-साथ आवागमन भी होता था। संगोष्ठी में तिब्बत सरकार के अधिकारी, अधिष्ठाता अध्ययन प्रो. एसएस चौहान, कॉलेज डेवेलपमेंट परिषद के प्रो. राजेन्द्र चौहान व निदेशक अकादमिक स्टाफ  कॉलेज प्रो. बीएस मढ़ आदि मौजूद रहे।


समझौते को समझना जरूरी
तिब्बत नीति निर्माण संस्थान के निदेशक थुबतन सेंफल का कहना है कि इस संगोष्ठी का मकसद इस समझौते के सौ साल बाद महत्व को समझना है। तिब्बत स्वायत स्वतंत्र होता है, तो इसका लाभ चीन और भारत दोनों को होगा और शांति होगी। व्यापारिक और अंतरराष्ट्रीय संबंध अच्छे होंगे।

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