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एनसीईआरटी की रेफरेंस बुक्स काट रहीं जेब

Sat, 10 May 2014 08:13 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ Updated Sat, 10 May 2014 08:13 AM IST
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refrence books were cutting the pockets

11वीं में एनसीईआरटी की फिजिक्स बुक की कीमत महज 105 रुपये है। मार्केट में फिजिक्स की रेफरेंस बुक की कीमत 750 रुपये है। राजेश के स्कूल में निश्चित पब्लिर्श की किताब खरीदने का फरमान है इसलिए उसे दोनों किताबें खरीदनी पड़ती हैं।

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कक्षा 12 की अकाउंटेंसी की बुक की कीमत 450 रुपये है। वहीं, एनसीईआरटी की अकाउंटेंसी की बुक 85 रुपये में ही मिल जाती है। पढ़ने के लिए स्टूडेंट्स भले ही एनसीईआरटी की किताब ले लें लेकिन प्रैक्टिस के लिए स्कूलों में निश्चित पब्लिकेशन की रेफरेंस बुक खरीदनी पड़ती हैं।
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एनसीईआटी और रेफरेंस बुक्स की कीमत में यह अंतर के यह केवल दो उदाहरण हैं। एनसीईआरटी ने जिन किताबों की कीमत 50-60 रुपये तय कर रखी है। उन्हीं विषयों की रेफरेंस बुक की कीमतें 400-500 रुपये से कम नहीं है।
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कीमतों में इतना ज्यादा अंतर कहीं से भी सामान्य नहीं नजर आता। निजी स्कूलों पर कोई लगाम न होने के कारण वे अपनी मनमानी करते हैं। स्कूलों और प्रकाशकों की मिलीभगत से अभिभावकों को एनसीईआरटी बुक्स के साथ ही महंगी-महंगी रेफरेंस बुक भी खरीदने को मजबूर किया जाता है।

12वीं तक की कक्षाओं में एनसीईआरटी (नेशनल काउंसिल फॉर एजूकेशन रिसर्च एंड ट्रेनिंग) से पास सिलेबस ही चलता है। एनसीईआरटी अपनी किताबें भी प्रकाशित करता है।

सीबीएसई बोर्ड से संबद्ध स्कूलों में एनसीईआरटी की किताबें ही चलती हैं। इसके बावजूद निजी स्कूल अपनी मनमानी करते हुए बच्चों से रेफरेंस बुक खरीदने का दबाव बनाते हैं। रेफरेंस बुक और एनसीईआरटी बुक्स की कीमतों में कई गुने का अंतर है।

स्कूल संचालकों और निजी स्कूलों की मिलीभगत के कारण रेफरेंस बुक की कीमतें आसमान छूती हैं। स्कूल संचालक का हर किताब पर कमीशन सेट होता है। यह कमीशन 40 से 50 फीसदी तक होता है।

यही वजह है कि प्रकाशक मनमानी कीमतें वसूलते हैं। अमीनाबाद मार्केट में दुकानदार जहां सामान्य किताबों पर 10 से 20 प्रतिशत तक की छूट देने को तैयार हो जाते हैं वहीं, निजी स्कूल की किताबों में कमीशन तय होने के कारण एक रुपये का डिस्काउंट नहीं करते हैं।


किताबों के साथ कॉपियों में भी वसूली
एनसीईआरटी की किताबों की कीमतें तय हैं इसलिए रेफरेंस बुक की कीमतों से प्रकाशकों और स्कूलों की मनमानी का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। यह व्यवस्था कॉपियों के संबंध में लागू नहीं है। कॉपियों में तो कमीशन का खेल और ज्यादा है। 

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