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इस वर्दी को देखकर प्रिंस को आई पुरखों की याद

Fri, 08 Nov 2013 10:19 AM IST
आफताब अजमत/ अमर उजाला, देहरादून
आफताब अजमत/ अमर उजाला, देहरादून Updated Fri, 08 Nov 2013 10:19 AM IST
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prince charles remember his elders

दोपहर करीब 12:30 बजे प्रिंस ऑफ वेल्स प्रिंस चार्ल्स और कैमिला पार्कर आईएमए स्थित विक्रम बत्रा मैस पहुंचे। यहां इंडियन मिलिट्री एकेडमी (आईएमए) और राष्ट्रीय इंडियन मिलिट्री (आरआईएमसी) कैडेट उनके स्वागत के लिए खड़े थे।

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कैडेटों की वर्दी और निशान पहचाना
आरआईएमसी कैडेटों की वर्दी देखकर प्रिंस को अपने पुरखों की याद आ गई। प्रिंस चार्ल्स ने आरआईएमसी कैडेटों की वर्दी देखी और उनका निशान पहचान लिया। हालांकि आरआईएमसी का नाम बदलने के बाद ब्रिटिश निशान को बदलकर ‘पिकॉक’ कर दिया गया था। लेकिन इससे मिलता जुलता ऑर्चिड का निशान आज भी रॉयल मिलिट्री एकेडमी में चलता है।
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आजादी से पहले ऑर्चिड का निशान ही आरआईएमसी में भी चलता था। आईएमए कमांडेंट ले.जन. मानवेंद्र सिंह से उन्हें आरआईएमसी की स्थापना की जानकारी दी।

प्रिंस ऑफ वेल्स से मिलने के लिए आरआईएमसी कमांडेंट कर्नल एचएस बैंसला के साथ 40 कैडेटों का दल आईएमए पहुंचा था। प्रिंस ने कैडेट वतनदीप, अनुज सक्सेना, अब्दुल मलिक से बात करते हुए उनका रूटीन पूछा। प्रिंस चार्ल्स ने कैडेटों से आरआईएमसी आने का वादा किया।


प्रिंस ऑफ वेल्स ने की थी स्थापना
आरआईएमसी की स्थापना 13 मार्च 1922 को तत्कालीन प्रिंस ऑफ वेल्स एडवर्ड ने की थी। उस वक्त कॉलेज का नाम द प्रिंस ऑफ वेल्स रॉयल इंडियन मिलिट्री कॉलेज था। यहां से पासआउट होने वाले कैडेटों को रॉयल मिलिट्री एकेडमी सैंडहर्ट्स में प्रशिक्षण दिया जाता था।

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इस कॉलेज का उस वक्त मकसद युवाओं को शिक्षित और प्रशिक्षित कर एंपायर पॉलिसी के तहत अधिकारी बनने के लिए सैंडहर्ट्स भेजना था। उस वक्त आरआईएमसी, ब्रिटिश रॉयल एकेडमी के लिए एक फीडर कॉलेज की भूमिका निभाता था। आजादी के बाद कॉलेज का नाम बदलकर राष्ट्रीय इंडियन मिलिट्री कॉलेज कर दिया गया।

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