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तब हॉकी शबाब पर थी और अब गुमनाम है

Sun, 17 Nov 2013 03:29 PM IST
अमर उजाला, देहरादून
अमर उजाला, देहरादून Updated Sun, 17 Nov 2013 03:29 PM IST
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no facilities for hockey

देहरादून में हॉकी के लिए न ही मैदान है और न कोच। यहां तक कि टूर्नामेंट भी नहीं, क्या ऐसे हॉकी का विकास हो सकता है।

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एक समय था जब हॉकी और फुटबॉल दोनों बराबरी पर थे, लेकिन आज सबकुछ कहीं खो सा गया है। राज्य में हॉकी की बदहाली पर यह कहना है साईं सेंटर बंगलुरू के हॉकी कोच वासु थपलियाल का। वह उत्तराखंड में भी कोचिंग देना चाहते हैं।
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पटेल रोड निवासी वासु थपलियाल मूल रूप से पौड़ी जिले के थापली गांव के निवासी हैं। शनिवार शाम अपने गुरू लक्ष्मण दास शर्मा से मिलने गए वासु ने अमर उजाला के साथ दून में हॉकी के बीते दिनों की यादें साझा की। उन्होंने बताया कि उनका जन्म लखनऊ में हुआ लेकिन पिता ओमप्रकाश थपलियाल के रिटायर होने के बाद वह दून आकर बस गए।
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हॉकी अपने शबाब पर थी
डीएवी कॉलेज में पढ़ाई के दौरान 1978 में उन्हें इंटर यूनीवर्सिटी खेलने का मौका मिला। तब देहरादून में हॉकी अपने शबाब पर थी। शहर में 22 क्लब थे, जिनके बीच पवेलियन ग्राउंड और पुलिस लाइन में जिला लीग होती थी। वह ग्रीन इंडिपेंडेंट क्लब से खेला करते थे।


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तब शहर में होने वाले पांच बड़े हॉकी टूर्नामेंट में खेलने के लिए खिलाड़ी बेचैन रहते थे, लेकिन आज यह सब नहीं है। स्पोर्ट्स कॉलेज है, जहां खिलाड़ी भी अच्छे हैं, लेकिन बिना एस्ट्रो टर्फ मैदान के वे आगे नहीं बढ़ पाते। उन्होंने कहा कि सिर्फ ट्रेनिंग से कोई खिलाड़ी नहीं बन सकता, उसके लिए टूर्नामेंट और कंप्टीशन होना भी बहुत जरूरी है।

खेल को बढ़ावा देने के लिए 2009 में राज्य सरकार को एक प्रोजेक्ट भी भेजा गया था, लेकिन उस पर कोई अमल नहीं हुआ।

भारतीय कोच हैं बेहतर
वासु थपलियाल का कहना है कि प्रशिक्षण देने में भारतीय कोच भी सक्षम हैं। हमारे पास जो तकनीक और स्किल है, वो दूसरे देशों के पास नहीं है। जितनी छूट विदेशी कोचों को मिलती है, उतनी भारतीय कोचों को मिले तो क्या नहीं कर सकते।

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