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लविवि में एग्रीकल्चर की पढ़ाई पर ग्रहण
आशीष त्रिवेदी/लखनऊ
Updated Sat, 30 Nov 2013 02:23 AM IST
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एलयू में एग्रीकल्चर फैकल्टी बनाए जाने का काम अभी अधर में लटका हुआ है। अभी यूनिवर्सिटी प्रशासन इस पर कोई अंतिम निर्णय भी नहीं ले पाया है।
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राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद (नैक) मूल्यांकन की तैयारी कर रहे एलयू प्रशासन का ध्यान अब तक इस ओर नहीं गया है। नैक में ए ग्रेड पाने की तैयारी में जुटी यूनिवर्सिटी बीते चार वर्षों में यह महत्वपूर्ण फैसला नहीं ले पाया है।
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सूबे की राजधानी में ही एग्रीकल्चर की पढ़ाई का बुरा हाल है। लखनऊ यूनिवर्सिटी में चार साल पहले जब एग्रीकल्चर फैकल्टी बनाने का निर्णय हुआ तो बख्शी का तालाब स्थित चंद्रभानु गुप्त कृषि महाविद्यालय इससे जुड़ गया।
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उम्मीद जताई गई थी कि यहां पर एग्रीकल्चर की पढ़ाई के लिए और कॉलेज खुलेंगे। मगर हुआ इसका उल्टा। जो एक कॉलेज इससे संबद्ध है वह भी बॉटनी विभाग से संबद्ध होकर जैसे-तैसे चलाया जा रहा है।
हालांकि यह व्यवस्था एग्रीकल्चर फैकल्टी के गठन होने तक की गई थी। मगर इसके बाद एलयू प्रशासन नई फैकल्टी ही बनाना भूल गया।
इधर चंद्रभानु गुप्त कृषि महाविद्यालय ने कई बार नई फैकल्टी बनाए जाने की मांग की लेकिन हर बार मामला यह कहकर टाल दिया जाता था कि इसे कार्य परिषद की बैठक में रख कर पास करवाया जाएगा।
इधर यूनिवर्सिटी प्रशासन नैक मूल्यांकन की तैयारियों में जुटा है। यूनिवर्सिटी में किए गए नए-नए कामों का पूरा ब्योरा तैयार किया जा रहा है। लेकिन एग्रीकल्चर फैकल्टी बनाने की सुध किसी को नहीं है।
जबकि नैक मूल्यांकन में कोई नई फैकल्टी खुली यह नहीं इसका ब्योरा भी पूछा जाता है।
इस बारे में बॉटनी विभाग के अध्यक्ष प्रो. वाईके शर्मा से जब इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि अभी यह कॉलेज हमारे विभाग से ही संबद्ध है।
कार्य परिषद ही इस पर कोई अंतिम निर्णय लेगा। इसके बाद एग्रीकल्चर की फैकल्टी बनाई जाएगी।
बीते 13 वर्षों से नहीं बनी कोई नई फैकल्टी
एलयू में वर्ष 2000 में जब उप्र प्राविधिक विश्वविद्यालय (यूपीटीयू) बना तो साइंस एंड टेक्नोलॉजी और जब किंग जार्ज मेडिकल कॉलेज यूनिवर्सिटी बना तो मेडिकल फैकल्टी वहां स्थानांतरित हो गई।
यह दोनों पहले एलयू से ही संबद्ध थे। इसके बाद एलयू में वर्ष 2006 में तत्कालीन कुलपति प्रो. आरपी सिंह ने फैकल्टी ऑफ सोशल वर्क, फैकल्टी ऑफ मॉस कम्युनिकेशन और फैकल्टी ऑफ मैनेजमेंट साइंसेज का प्रस्ताव रखा। वह प्रस्ताव भी पास नहीं हो पाया। अब एग्रीकल्चर फैकल्टी का मामला भी लटका हुआ है।
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