ऑनलाइन का वादा, हकीकत कम, फंसाना ज्यादा
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लखनऊ विश्वविद्यालय में एडमिशन प्रक्रिया को छोड़कर अन्य सारे काम ऑफलाइन किए जा रहे हैं।
स्टूडेंट्स के विरोध के बावजूद एडमिशन प्रक्रिया को हाईटेक बना दिया गया लेकिन जब स्टूडेंट्स को सुविधा देने की बात आई तो परीक्षा फॉर्म, एडमिट कार्ड से लेकर प्रोविजिनल प्रमाण पत्र लेने तक छात्र-छात्राएं कार्यालयों के चक्कर लगा रहे हैं।
स्टूडेंट्स को सूचना तकनीक के साथ चलने की नसीहत देते हुए लविवि ने शैक्षिक सत्र 2013-14 की एडमिशन प्रक्रिया पूरी तरह से ऑनलाइन कर डाली।
स्टूडेंट्स ने दूरदराज और ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट की सुविधा न होने का हवाला देते हुए इसका विरोध भी किया पर लविवि ने एक न सुनी। इस वजह से इस साल एडमिशन प्रक्रिया सितंबर तक चली।
इस दौरान ऑनलाइन काउंसलिंग की वजह से अच्छी मेरिट वाले स्टूडेंट्स दाखिले से वंचित रह गए और कम मेरिट वालों को एडमिशन मिलने के मामले भी सामने आए।
ऑनलाइन एडमिशन की तरह लविवि ने छात्रहित के लिए कई चीजों को ऑनलाइन करने की घोषणा की पर उनको पूरा करने में वो नाकाम रहा। छात्रहित से जुड़े ज्यादातर कामकाज ऑफलाइन ही हो रहे हैं।
परीक्षा के ज्यादातर काम कागजों पर
लविवि ने एडमिशन प्रक्रिया की तरह परीक्षा संबंधी काम को ऑनलाइन करने की शुरुआत जल्द करने की बात कही थी। ऑनलाइन प्रक्रिया में स्टूडेंट्स को परीक्षा फॉर्म विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर ही भरने का मौका मिलता।
इसी तरह प्रवेश पत्र भी विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर मिल जाते। वर्ष 2014 की वार्षिक परीक्षाओं के लिए परीक्षा फॉर्म भरने के संबंध में आदेश जारी हो चुका है। परीक्षा फॉर्म ऑफलाइन ही भरे जाने हैं। विश्वविद्यालय ने इसके लिए 13 फरवरी लास्ट डेट तय कर दी है।
जेआरएफ स्टूडेंट्स भी लगा रहे दौड़
लखनऊ विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों में शोध कार्य कर रहे जूनियर रिसर्च फेलोज को अभी भी अपनी स्कॉलरशिप के लिए प्रशासनिक भवन के चक्कर लगाने पड़ते हैं। हाईटेक व्यवस्थाओं की बातें बस कहने के लिए हैं।
वास्तविक स्थिति कुछ और ही है। बाकी विश्वविद्यालयों में जेआरएफ की स्कॉलरशिप सीधे उनके खातों में पहुंचता है। इस मामले में भी लविवि ऑफलाइन है। हालत यह है कि जेआरएफ अभ्यर्थियों को छह-छह महीने तक अपने भुगतान के लिए तरसना पड़ता है।
वाई-फाई अब भी दूर की कौड़ी
लखनऊ विश्वविद्यालय के कैम्पस को पूरी तरह से वाई-फाई करने का शिगूफा पूर्व कुलपति प्रो. एस एस बरार के समय में ही छोड़ा गया था। इसके बाद एक और कुलपति का पूरा कार्यकाल निकल गया लेकिन विश्वविद्यालय में वाई-फाई चालू नहीं हो पाया।
विश्वविद्यालय के चक्कर लगा रहे स्टूडेंट्स
शैक्षिक सत्र 2013-14 की शुरुआत पर लविवि की वेबसाइट का नए सिरे से निर्माण शुरू हुआ। दावा किया गया कि विश्वविद्यालय की वेबसाइट बनने के बाद स्टूडेंट्स को अपनी डिग्री और प्रोविजिनल के लिए एलयू के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे।
वेबसाइट के माध्यम से स्टूडेंट्स कहीं से भी डिग्री आदि के लिए आवेदन कर सकेंगे और लविवि उनकी डिग्री तैयार कर देगा। कानपुर विश्वविद्यालय में डिग्री और अन्य प्रमाणपत्रों के संबंध में ऑनलाइन व्यवस्था ही लागू है। विश्वविद्यालय की वेबसाइट का निर्माण शुरू हो गया लेकिन कई महीने गुजरने के बावजूद अभी तक वेबसाइट पूरी तरह तैयार नहीं है।
तीन साल में नहीं बन सका डाटाबेस
उच्च शिक्षा विभाग की ओर से लविवि समेत सभी राज्य विश्वविद्यालयों को शिक्षक, स्टूडेंट्स और कर्मचारी का डाटाबेस तैयार करने के लिए करीब तीन साल पहले साढ़े 16 लाख रुपये जारी किए गए थे।
यह डाटाबेस विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर ऑनलाइन होना था। मंशा थी कि विश्वविद्यालय के साथ ही सभी सहयुक्त कॉलेजों में पढ़ने वाले स्टूडेंट्स, पढ़ाने वाले शिक्षक और काम करने वाले कर्मचारियों के बारे में पूरी जानकारी एक क्लिक पर मिल सके।
डाटाबेस बनने के बाद कॉलेजों में निर्धारित सीट से ज्यादा दाखिले होने पर मामला तुरंत पकड़ में आ सकता है। इसी तरह कॉलेजों गैर अर्ह शिक्षकों को या फिर शिक्षकों की फर्जी तैनाती पर भी रोक लग सकेगी।