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केजीएमयू को राष्ट्रीय पहचान दिलाने की कवायद शुरू

Fri, 27 Jun 2014 03:26 AM IST
अमित यादव/अमर उजाला, लखनऊ
अमित यादव/अमर उजाला, लखनऊ Updated Fri, 27 Jun 2014 03:26 AM IST
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Kgmu plans for national recognition

किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) को इस तरह से विकसित किया जाएगा कि वह राष्ट्रीय महत्व का संस्थान बन सके।

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इसके लिए शोध को बढ़ावा देने के साथ-साथ कई सुपर स्पेशिएलिटी पाठ्यक्रम भी शुरू किए जाएंगे। विवि की एकेडमिक काउंसिल की गुरुवार को हुई बैठक में कई फैसले लिए गए।

कुलपति प्रो.रविकांत ने एकेडमिक काउंसिल की बृहस्पतिवार को आयोजित बैठक में रखे गए प्रस्तावों के बारे में बताया कि इंस्टीट्यूट ऑफ नेशनल इंपॉर्टेंस बनने से केजीएमयू सीधे केंद्र से जुड़ जाएगा।
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इससे संस्थान को न तो फंडिंग की कमी होगी और न ही मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया की घुड़कियों से डरना होगा।

वर्तमान में फंड की कमी, वेतन कम होने से शिक्षकों के पलायन, शोध करने के लिए उचित माहौल न मिलने से राष्ट्रीय स्तर पर संस्थान की रेटिंग अच्छी नहीं है।

कुलपति ने बताया कि राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने के लिए इलाज के साथ-साथ शोध और नए पाठ्यक्रम शुरू करने पर बैठक में फैसला लिया गया।

उन्होंने बताया कि शोध को बढ़ावा देने के लिए असिस्टेंट प्रोफेसर को एक लाख रुपये केजीएमयू उपलब्ध कराएगा।

एसोसिएट प्रोफेसर और उनके ऊपर के शिक्षकों को शोध के लिए राष्ट्रीय एजेसियों के पास जाना होगा।

कुलपति ने बताया कि किसी भी शोध के प्रस्ताव को पास कराने के लिए पहले उसे विभागाध्यक्ष, फिर डीन की अध्यक्षता में बनी कमेटी से अनुमति लेनी होगी।

इसके बाद एथिक्स कमेटी प्रस्ताव को देखेगी। प्रस्ताव को बनाने में भी शिक्षकों और छात्रों की मदद की जाए, ताकि फंड मिलने में दिक्कत न हो।

कुलपति प्रो. रविकांत ने शिक्षकों के कम वेतन को केजीएमयू के विकास में बाधा बताया। बैठक में इस मुद्दे पर भी चर्चा की गई। फैसला लिया गया है कि मुख्यमंत्री को इसके लिए एक प्रत्यावेदन भेजा जाएगा।
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उन्होंने बताया कि केजीएमयू के शिक्षकों को डॉ. राम मनोहर लोहिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज, रूरल इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज सैफई और एसजीपीजीआई से भी कम वेतन मिलता है।

यही कारण है कि एक के बाद सीनियर फैकल्टी संस्थान छोड़कर वहां जाना चाहती है।

हाल ही में माइक्रोबॉयोलॉजी विभाग से एक फैकल्टी ने वहां जाने की अनुमति मांगी है। इससे पहले भी कई वरिष्ठ शिक्षक वहां जा चुके हैं।

कई शिक्षकों ने अन्य राज्यों में खुले एम्स में ज्वाइन कर लिया है। दो साल में लगभग 20 सीनियर फैकल्टी विभिन्न संस्थान जा चुकी है।

यदि वेतन और अन्य सुविधाएं सभी संस्थानों के बराबर होंगे तो अच्छे शिक्षकों का पलायन रुकेगा।

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