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कुर्बानी की राह पर चलकर मिली कामयाबी
आफताब अजमत / अमर उजाला, देहरादून
Updated Sun, 04 May 2014 02:49 PM IST
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जेईई मेंस परीक्षा में शानदार प्रदर्शन करने वाले देहरादून के युवाओं की कहानियां भी काफी प्रेरणादायी हैं।
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किसी ने दो साल तक अपने शौक को कुर्बान करके रखा तो किसी ने दून से बाहर कदम ही नहीं निकाला। एक छात्र के पिता का देहांत होने के बाद मां हर पल सहारा बनकर खड़ी रही।
मां बनी हौसला
आशीर्वाद एन्क्लेव निवासी अग्निभ शर्मा के लिए यह कामयाबी काफी मायने रखती है। दो साल पहले जब वे दसवीं में थे तो पिता सुमन कुमार शर्मा की ब्रेन हेमरेज से मौत हो गई थी। बड़ी बहन और अग्निभ के लिए यह पल बेहद मुश्किल था।
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अग्निभ को हमेशा यह अहसास होता था कि अब जिंदगी में न जाने क्या होगा लेकिन उनकी मां नीलम शर्मा ने बेटे का हौसला बनाए रखा।
जब भी पापा को याद कर वे उदास होते तो मां तुरंत बाप का साया बनकर हौसला बढ़ाती।
अग्निभ का कहना है कि उनके लिए इस परीक्षा को पास करने तक का सफर काफी चुनौतीपूर्ण था लेकिन मां ने हर मुश्किल हो आसान कर दिया।
दो साल से नहीं थामा बल्ला
वैभव गुंसाई को क्रिकेट बहुत पसंद है लेकिन उन्हें बल्ले की सूरत देखे हुए दो साल हो गए हैं। उन्होंने बताया कि 10वीं के बाद से ही उन्होंने अपने सभी शौक छोड़ दिए थे।
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दो साल तक पढ़ाई पर पूरा फोकस रखा। उनका कहना है कि एक बार आईआईटी में दाखिला मिल जाने के बाद वह अपने क्रिकेट के शौक को जरूर पूरा करेंगे।
बहन बनी प्रेरणा
महंत इंदिरेश हॉस्पिटल में कार्यरत मां डा. नीता बंसल और पिता डा. नितिन बंसल की बड़ी बेटी नितिका बंसल के बाद अब बेटा नैवेद्य बंसल भी इंजीनियरिंग की राह पर है।
नैवेद्य का कहना है कि उनकी बड़ी बहन ने सिंगापुर से बीटेक कंप्यूटर साइंस किया था। फिलहाल वह माइक्रोसॉफ्ट कंपनी में यूएसए में जॉब कर रही हैं।
बड़ी बहन की यह कामयाबी नैवेद्य के लिए हमेशा ही बेंचमार्क रही। जब भी उससे बात होती तो वह उसे काबिल और कामयाब इंजीनियर बनने के लिए प्रेरित करतीं।
बहन की तरह सपने को पूरा करने के लिए नैवेद्य ने अपने तबले और क्रिकेट के शौक को छोड़कर रखा। मां-पिता का कहना है कि उन्होंने हमेशा बच्चों की मर्जी को सर्वोपरि रखा। इसलिए वह दोनों डॉक्टर हैं और उनके बच्चे इंजीनियर।
दो साल तक भूल गए शौक
दून में पहले स्थान पर रहे प्रखर गुप्ता ने भी इस परीक्षा के लिए अपने सभी शौक किनारे रख दिए थे।
उन्हें खाली समय में टीवी देखना और क्रिकेट खेलना बेहद पसंद था, लेकिन इस परीक्षा के लिए वह सबकुछ भूल गए। वह दो साल से शहर से बाहर कहीं घूमने नहीं गए हैं। उन्होंने दो साल से टारगेट बनाकर जेईई की तैयारी की है।