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LU: लाइब्रेरी में लिखी गई बड़े घोटाले की स्क्रिप्ट
आशीष त्रिवेदी/लखनऊ
Updated Wed, 09 Oct 2013 06:57 PM IST
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एलयू की टैगोर लाइब्रेरी में अनियमितताएं चरम पर हैं, लेकिन इनकी ओर ध्यान देने वाला कोई नहीं।
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लाइब्रेरी के लिए हाल ही में 30 लाख रुपये की जो किताबें खरीदी गईं, उनमें जमकर धांधली की गई। टैगोर लाइब्रेरी में इस समय करीब 5.50 लाख किताबें मौजूद हैं।
एलयू में बीते फरवरी महीने में पुस्तक मेला आयोजित किया गया था। इस पुस्तक मेले के माध्यम से टीचर्स व स्टूडेंट की पसंद की किताबें खरीदी जानी थी, लेकिन ऐसा नहीं हो सका।
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बगैर स्टॉल के किताबों की हुई सप्लाई
एलयू प्रशासन विभागाध्यक्ष के माध्यम से किताबें खरीदने का दम भर रहा है, लेकिन उसने जो किताबें खरीदी हैं उन पर सवाल खड़े हो गए हैं। पुस्तक मेले में जिन पब्लिशर्स ने अपना स्टॉल नहीं लगाया उनसे भी किताबें खरीदी गईं।
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विश्वविद्यालयों में नियम है कि किताबें सप्लाई करने वाले वेंडर का रजिस्ट्रेशन होना चाहिए। इतना ही नहीं उनका एक टर्न निर्धारित होता है इसके बाद नए सिरे से चयन प्रक्रिया होती है।
मगर यहां ऐसा कुछ नहीं हो रहा। अब एलयू में स्टॉक वेरिफिकेशन के लिए कुलपति डॉ. एसबी निमसे के निर्देश में एक कमेटी गठित की गई है।
और तो और यूनिवर्सिटी के ही प्रोफसर्स की लिखी किताबों की कई प्रतियां खरीद ली गईं। जबकि एलयू वीसी डॉ. एसबी निमसे ने खुद निर्देश दिए हैं कि एक ही किताब की इतनी अधिक प्रतियां न खरीदी जाएं।
पुराने एडिशन की खरीदीं किताबें
लाइब्रेरी में नई व अपडेट एडिशन की किताबें खरीदने का नियम है लेकिन टैगोर लाइब्रेरी में ऐसा नहीं हो रहा। फ्लैन मैलो की भूगर्भ विज्ञान पर लिखी किताब ‘प्रिंसिपल ऑफ इग्नियस पेट्रोलॉजी’ का 1985 का एडिशन खरीद लिया गया।
यही नहीं 1988 में लिखी गई ‘इंट्रोडक्शन टू थ्योरिटिकल जियोमॉर्फोलॉजी’को खरीदा गया। इस किताब की कीमत 12 हजार रुपये है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब नए एडिशन की किताबें मार्केट में मौजूद हैं तो इन्हें क्यों खरीदा गया?
स्टिकर लिखी किताबें भी खरीदी गईं
टैगोर लाइब्रेरी में पसर्नालिटी डेवलपमेंट एंड सॉफ्ट स्किल किताब जो कि वरुण कुमार मिश्रा द्वारा लिखी गई है इसमें स्टिकर पर 290 रुपए मूल्य लिखा हुआ है जबकि स्टीकर के नीचे 260 रुपए कीमत लिखी हुई है।
दाम के इसी फर्जीवाड़े से बचने के लिए विवि प्रशासन ने नियम बनाया था कि स्टिकर लगी किताबें नहीं खरीदी जाएंगी। मगर इनकी खरीदारी धड़ल्ले से की जा रही है।
इश्यू हुईं कई किताबें
टैगोर लाइब्रेरी के चपरासी कृष्ण गोपाल शर्मा को 294 किताबें इश्यू की गईं। यह राज उसके मरने के बाद तब खुला जब विश्वविद्यालय प्रशासन ने फंड के भुगतान के समय देनदारी के बारे में पूछताछ की।
पता चला कि शर्मा को 294 किताबें इश्यू की गई थीं जिनकी कीमत करीब 27 हजार रुपये है। जबकि एलयू में प्रोफेसरों को एक समय में अधिकतम 12 किताबें इश्यू करने का नियम है।
यूरो में खरीदी गईं किताबों के भुगतान में भी खेल
31 मार्च से पहले खरीदी गई किताबों का भुगतान अभी के रेट में किया जा रहा है। विदेशी मुद्रा में किताबें खरीदने के लिए गुड ऑफिस कमेटी का गठन किया गया है।
उस समय एक यूरो का रेट करीब 69.5 रुपए के लगभग था। इस समय सितंबर में 84.15 रुपए चल रहा है। ऐसे में जब खरीद मार्च में हुई तो फिर अब इसका भुगतान वर्तमान दर पर क्यों किया गया। बीच की रकम आखिर किसकी जेब में गई।