डीयू इलेक्शन पर चढ़ा सोशल मीडिया का बुखार
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राजनीति की पाठशाला माने जाने वाली दिल्ली विश्वविद्यालय स्टूडेंट यूनियन (डूसू) चुनाव में काबिज होने के लिए छात्र संगठनों ने कमर कस ली है।
चुनाव तिथि की घोषणा के साथ ही छात्र संगठनों के साथ संभावित उम्मीदवार कैंपस में ही नहीं, सोशल मीडिया पर भी सक्रिय हो गए हैं।
सोशल मीडिया के सभी प्लेटफॉर्म पर छात्र संगठन से लेकर टिकट पाने की दौड़ में शामिल नेता स्टूडेंट के साथ सीधे जुड़ रहे हैं। डीयू में अगले माह 12 सितंबर को डूसू चुनाव के लिए वोट पड़ेंगे।
वॉट्सऐप पर ग्रुप बनाकर चला रहे हैं कैंपेन
सोशल मीडिया वह प्लेटफॉर्म है जहां डीयू के अधिकांश छात्र सक्रिय हैं। फेसबुक, ट्विटर हो या मोबाइल पर वाट्स ऐप, ये सभी माध्यम युवाओं से अछूते नहीं हैं। छात्र संगठन ज्यादा दौड़भाग के बजाय इन्हीं पर ज्यादा रूचि ले रहे हैं। कोई फेसबुक पर पेज बनाकर प्रचार कर रहा है तो कोई वाट्स ऐप पर अपना ग्रुप बनाकर ज्यादा से ज्यादा छात्रों को जोड़ रहा है।
छात्र सोशल मीडिया पर सिर्फ अपना ही नहीं बल्कि स्टूडेंट कम्युनिटी को भी ज्वाइन कर रहे हैं जिसके माध्यम से वह ज्यादा से ज्यादा छात्रों से जुड़ सकें। डीयू में सेकेंड ईयर के छात्र अमितेश ने बताया कि उनके दोस्तों का वाट्स ऐप पर एक ग्रुप है। उस ग्रुप में पांच सौ से ज्यादा दोस्त हैं।
एक संभावित उम्मीदवार ने ग्रुप से जुड़ने के लिए संपर्क किया। अब वह रोजाना उस पर अपनी गतिविधियों के बारे में अपडेट कर रहा है। छात्र नेता भी मानते हैं कि यह अच्छा माध्यम है जहां हम बिना ज्यादा भागदौड़ के ज्यादा से ज्यादा लोगों तक अपनी बात पहुंचा पाते हैं।
मुख्य मुद्दा होगा सीसैट और एफवाईयूपी की वापसी
दिल्ली विश्वविद्यालय में छात्रसंघ चुनाव का इस बार का मुख्य मुद्दा सीसैट और चार साल अंडरग्रैजुएट प्रोग्राम एफवाई यूपी को वापस लिया होगा। अंग्रेजी दैनिक टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार यह एजेंडा 12 सितंबर को होने वाले चुनाव में मुख्यतः हर छात्र संघठन का होगा।
पिछले साल अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने एफवाईयूपी के विरोध के जरिए ही डीयू का छात्रसंघ चुनाव जीता था। ऑल इंडिया स्टूडेंट्स यूनियन ने भी इसके खिलाफ मुहिम की शुरूआत करके ही 8000 वोट हासिल किए थे और विश्वविद्यालय में अपनी जगह बनाई थी।
वहीं एनएसयूआई जिसने एफवाईयूपी का विरोध इसके वापस होने से कुछ समय पहले शुरू किया था वो सीसैट विरोधी संवेदनाओं के सहारे चुनावी जंग फतह करना चाहती है। हालांकि इंडियन नेशनल स्टूडेंट्स ऑर्गेनाइजेशन के इस साल विश्वविद्यालय में छाए रहने से इस बार का चुनाव हर बार की तरह केवल एबीवीपी और एनएसयूआई के बीच सिमट कर नहीं रहेगा।
एबीवीपी ने अबतक बनाए 45000 सदस्य
एबीवीपी के विरोधी मानते हैं कि एबीवीपी की विश्वसनीयता आरएसएस से है। वहीं एआईएसए के सुनील कुमार मानते हैं कि 'केंद्र में बीजेपी की जीत से भी एबीवीपी को काफी फायदा होगा।'
पिछले महीने एबीवीपी ने 45000 सदस्य बनाए हैं। एबीवीपी के राष्ट्रीय सचिव रोहित चहल ने बताया कि, 'हमारा टारगेट 60000 छात्र हैं। छात्र एबीवीपी से जुड़ने को उत्साहित हैं, खासतौर से एफवाईयूपी को वापस लिए जाने के बाद। हमने 14 उम्मीदवारों को चुना है।'
सीसैट अवश्य ही तीनों प्रमुख छात्र संगठनों के लिए बड़ा मुद्दा होगा। एक ओर जहां एबीवीपी ने इस मामले में केंद्र सरकार के हस्तक्षेप का स्वागत करते हुए पूरी तरह से अवलोकन की आशा रखता है वहीं एनएसयूआई मोदी सरकार को इस पूरे बवाल के लिए दोषी ठहरा रही है।
एनएसयूआई के प्रवक्ता अमरीश पांडे ने सीसैट मुद्दे पर मोदी सरकार को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि, 'मोदी सरकार छात्रों के पीठ पर छुरा भोंका है। हम सीसैट को वापस लेने की मांग जारी रखेंगे।' हालांकि, एबीवीपी दावा करती है कि ये कांग्रेस थी जिसने 2011 में ये भेदभावपूर्ण सीसैट लागू किया था।
AISA बनेगी NSUI के लिए रोड़ा
पिछले साल के अनुभवों के आधार पर एआईएसए भी सफलता की उम्मीद कर रही है। उनकी इस उम्मीद को एफवाईयूपी विरोधी आंदोलन की सफलता मजबूती प्रदान करती है।
एआईएसए के कुमार का कहते हैं कि 'इसमें कोई हैरत नहीं होगी अगर हम सभी सीटों पर एनएसयूआई को पछाड़ कर तीसरे स्थान पर ला दें। हम शायद एक या दो पद जीतें भी और सच में देखा जाए तो हम सभी पदों पर दूसरा स्थान हासिल करने की सोच रहे हैं।' इस चुनाव को कुछ अलग बनाते हुए एआईएसए ने अपना इश्यू बेस्ड आंदोलन जारी रखा है।
लेफ्ट समर्थित इस छात्र संगठन इस सेशन में पहले ही छात्रों का फीडबैक लेने के लिए 40 कॉलेजों का दौरा कर चुका है। कुमार का कहना है कि 'एनएसयूआई तो इस चुनाव में काफी पीछे है और एबीवीपी का चुनाव अभियान अभी भी पुराने ढर्रे पर ही चल रहा है
एआईएसए छात्रों से जुड़े मुद्दे को लेकर आंदोलन करती हुई आगे बढ़ रही है। करीब 60-70 प्रतिशत छात्र हमारे अभियान से जुड़ना चाहते हैं।'
एनएसयूआई चुनाव के दौरान अपना मुद्दा सीसैट और कॉलेज में आधारभूत सुविधाओं को रखेगी। जब एनएसयूआई के प्रवक्ता पांडे से पूछा गया कि उनकी पार्टी ने एफवाईयूपी विरोधी मुहिम क्यों शामिल हुई तो उनका दावा था कि 'पहले साल के अंत में हमें अहसास हुआ कि छात्र इससे खुश नहीं हैं इसलिए हमने इसका विरोध किया। लेकिन ये हमारा विरोध ही था जिसके चलते सरकार ने इसे वापस ले लिया।' हालांकि एबीवीपी के प्रदेस सचिव साकेत बहुगुणा बोले 'एफवाईयूपी की वापसी तो बीजेपी के मेनिफेस्टो में थी।'