पीएचडी कर रहे हैं तो पढ़े खबर, नियमों में हुए हैं कुछ बदलाव
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
लखनऊ विश्वविद्यालय में तैयार किए गए नए पीएचडी ऑर्डिनेंस में यूजीसी के नियमों की अनदेखी की गई है। इसकी वजह से अन्य पिछड़ा वर्ग के बहुत से अभ्यर्थी यहां आवेदन से वंचित हो रहे हैं। इन अभ्यर्थियों ने जब कुलपति और प्रवेश समन्वयक से इसे लेकर शिकायत की तो सभी के होश उड़ गए।
असल में यूजीसी ने जून 2014 में हुई राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (नेट) में ओबीसी अभ्यर्थियों के लिए अर्हता नियमों में बदलाव किया था। पहले ओबीसी के अभ्यर्थियों को भी यूजीसी नेट में आवेदन के लिए सामान्य वर्ग की तरह ही पीजी में 55 फीसदी अंकों की आवश्यकता होती थी। लेकिन जून 2014 से इसमें बदलाव कर पीजी में 50 फीसदी अंकों की बाध्यता लागू की गई।
लेकिन एलयू ने अपने नए पीएचडी ऑर्डिनेंस में अब भी पुरानी व्यवस्था के तहत ओबीसी के लिए पीजी में न्यूनतम 55 फीसदी अंकों की ही बाध्यता रखी हुई है। इसकी वजह से अब बहुत से अभ्यर्थी आवेदन से वंचित हैं।
यूजीसी के नए अर्हता नियमों के बाद बहुत से ओबीसी अभ्यर्थियों ने जेआरफ क्वालिफाई किया। लेकिन अब वे एलयू में पीएचडी के लिए आवेदन नहीं कर पा रहे हैं। इनमें कुछ ने तो आवेदन शुल्क भी जमा कर दिया है।
...तो संशोधित होगा पीएचडी ऑर्डिनेंस
एलयू का नया पीएचडी ऑर्डिनेंस तैयार करने में लगभग एक साल का समय लगा। यह ऑर्डिनेंस जुलाई में कार्यपरिषद से अनुमोदित भी हो गया। लेकिन सवाल ये उठता है कि जब पीएचडी ऑर्डिनेंस बनाया जाना शुरू हुआ उससे पहले ही यूजीसी ने नए अर्हता नियम लागू कर दिए थे।
वहीं ये मामला सामने आने के बाद विवि में शिक्षकों से लेकर अधिकारियों में इस बात की चर्चा शुरू हो गई है कि एलयू को अपने पीएचडी ऑर्डिनेन्स में संशोधन करना होगा। क्योंकि यदि विवि ऐसा नहीं करता है तो उसे न्यायालय में चुनौती भी दी जा सकती है।
सवाल उठ रहे हैं कि ऑर्डिनेंस बनाने में विवि स्तर पर गड़बड़ हुई है तो अभ्यर्थी आवेदन से वंचित क्यों रहें।