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रिपोर्ट में खुलासाः उत्तराखंड में प्राइवेट स्कूलों की चांदी

Sun, 08 Dec 2013 11:40 AM IST
अमर उजाला, देहरादून/नई दिल्ली
अमर उजाला, देहरादून/नई दिल्ली Updated Sun, 08 Dec 2013 11:40 AM IST
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government school is bad condition in uttarakhand

उत्तराखंड में सरकारी स्कूलों में पढ़ने में बच्चों की रुचि घट रही है, जबकि निजी स्कूलों में छात्रों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है।

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यह ट्रेंड हाल ही में मानव संसाधन मंत्रालय की ओर से जारी प्राथमिक शिक्षा रिपोर्ट में सामने आया है। रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखंड में पिछले एक साल में चालीस सरकारी स्कूल बंद हो चुके हैं, जबकि इसी अवधि में राज्य में लगभग तीन सौ निजी स्कूल खुले हैं।
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निजी स्कूलों का रुख कर रहे अभिभावक
यही नहीं, स्कूलों में छात्रों की संख्या के मामले में भी सरकारी स्कूलों में खासकर पांचवीं कक्षा तक के स्कूलों में काफी गिरावट दर्ज की गई है।

यद्यपि प्रदेश में निजी स्कूलों की तुलना में सरकारी प्राइमरी व अपर प्राइमरी स्कूलों की संख्या तीन गुना से भी अधिक है, लेकिन छात्र एवं अभिभावक निजी स्कूलों की ओर तेजी से रुख कर रहे हैं।
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इसी कारण निजी स्कूलों की मांग बनी हुई है, जबकि सरकारी स्कूलों को छात्र मिलना मुश्किल हो रहा है।प्रदेश के सरकारी स्कूलों में छात्रों की संख्या का यह हाल तब है, जबकि 93 फीसदी स्कूलों में सरकार की ओर से मिड डे मील वितरित किया जा रहा है।

सरकारी स्कूलों में बच्चों की संख्या में गिरावट का मुख्य कारण शिक्षा की गुणवत्ता में गिरावट को माना जा रहा है। सरकारी स्कूलों की संख्या तो बढ़ी है, किंतु पर्याप्त शिक्षक अब भी उनमें तैनात नहीं किए जा सके हैं।

उत्तराखंड में सरकारी स्कूलों में प्रति स्कूल शिक्षकों की संख्या लगभग 3.3 है, जबकि सरकार से सहायता प्राप्त निजी स्कूलों में औसतन सात तथा गैर सहायता प्राप्त निजी स्कूलों में छह शिक्षक प्रति स्कूल तैनात हैं।


शिक्षकों की उपस्थिति बहुत खराब
सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की तैनाती में भी भारी असमानता है। तमाम स्कूलों में केवल एक या दो शिक्षक ही तैनात हैं। सरकारी प्राइमरी व अपर प्राइमरी स्कूलों में शिक्षकों की उपस्थिति भी बहुत खराब रहती है।

दूसरी ओर, निजी स्कूलों में छात्रों की तुलना में शिक्षकों की कमी होते हुए भी ज्यादा उपस्थिति एवं पढ़ाई के चलते बेहतर परिणाम रहता है। रिपोर्ट के अनुसार निजी स्कूलों में औसतन 23 छात्र पर एक शिक्षक नियुक्त हैं, वहीं सरकारी प्राइमरी स्कूलों में 15 छात्र पर एक शिक्षक की तैनाती है।

इसका मतलब यह है कि ज्यादा सरकारी स्कूल तथा छात्रों के औसत में ज्यादा शिक्षक होने के बावजूद छात्रों का रुझान निजी स्कूलों की ओर ही अधिक है।

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