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संस्कृत महोत्सव: जीवन पद्धति से जुड़ी है ये भाषा

Wed, 21 Aug 2013 09:28 AM IST
लखनऊ/इंटरनेट डेस्क
लखनऊ/इंटरनेट डेस्क Updated Wed, 21 Aug 2013 09:28 AM IST
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first day of sanskrit mahotsava

यूरोपीय जैसे-जैसे संस्कृत की महत्ता और गरिमा समझते गए वैसे-वैसे भारतीय

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संस्कृति के मुरीद बनते गए।

अंग्रेजी हुकूमत के दौरान मैकाले ने अंग्रेजी को राष्ट्रभाषा बनाकर संस्कृत की अहमियत घटाने का प्रयास किया। इसके बाद आजाद भारत में बनी सरकारों ने इसे महज एक भाषा मानना शुरू कर दिया जबकि यह तो हमारी जीवन पद्धति से जुड़ी हुई है।

इसके बावजूद संस्कृत के उत्कृष्ट साहित्य के कारण विश्व में इसकी अलग पहचान बन रही है। पिछले 100 वर्षों में संस्कृत में 350 से ज्यादा महाकाव्य लिखे गए हैं।


ये बातें, संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय (वाराणसी) के पूर्व कुलपति अभिराज राजेंद्र मिश्र ने कहीं। वे मंगलवार को राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान में शुरू हुए चार दिवसीय संस्कृत महोत्सव के पहले दिन बतौर मुख्य अतिथि महोत्सव को संबोधित कर रहे थे। महोत्सव का आयोजन संस्कृत दिवस के अवसर पर किया गया।


डॉ. अंबेडकर विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर (बिहार) के प्रो. सतीश चंद्र झा ने कहा कि मिथिला के कुछ गांवों में ऐसे स्कूल हैं जहां होने वाले वेद-पाठों को सुनने के लिए ग्रामीणों की भारी भीड़ जुटती है।

उन्होंने गांवों में वेद पाठशालाएं खोलने की जरूरत बताईं। महोत्सव की अध्यक्षता करते हुए संस्थान के प्राचार्य अर्कनाथ चौधरी ने कहा कि महाभाष्यकर पतंजलि ने संस्कृत को सातों द्वीपों की भाषा बताई है। शुभारंभ के अवसर पर गोपीचंद दुबे ने वैदिक मंगलाचरण और छात्राओं ने सरस्वती वंदना की।

कार्यक्रम में व्याकरण विभागाध्यक्ष प्रो. सुरेंद्र पाठक, साहित्य विभागाध्यक्ष प्रो. रामलखन पांडेय, प्रो. उमारमण झा, प्रो. लोकमान्य मिश्र, प्रो. विजयकुमार जैन, शिशिर कुमार पांडेय, भारतभूषण पांडेय, अवधेश कुमार चौबे आदि मौजूद थे।

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