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आखिर क्यों घट गई इंजीनियरिंग कॉलेजों की फीस?
लखनऊ/शैलेंद्र श्रीवास्तव
Updated Wed, 14 Aug 2013 01:11 AM IST
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प्रदेश में निजी इंजीनियरिंग कॉलेजों के प्रति छात्रों का मोह तेजी से भंग हो रहा है। खासकर छोटे शहरों में खुले कॉलेजों के प्रति ऐसा ही रुझान सामने आया है।
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इसके चलते कई ऐसे निजी इंजीनियरिंग कॉलेज हैं, जिनकी फीस वर्ष 2010 में ज्यादा निर्धारित की गई थी लेकिन इस वर्ष इसे कम कर दी गई है।
फीस में 20 से 40 हजार रुपये तक की कमी आई है। फीस निर्धारण कमेटी इसका मिलान करा रही है कि कितने कॉलेजों की फीस कम की गई है।
फीस निर्धारण कमेटी निजी कॉलेजों में प्रति छात्र खर्च के हिसाब से प्रत्येक तीन साल पर फीस का निर्धारण करती है।
वर्ष 2010 में जब कॉलेजों की फीस निर्धारित की गई थी तो उस समय 345 कॉलेज थे। इसलिए निजी कॉलेजों की सभी सीटें भी भर जाती थीं।
उस समय छोटे कॉलेजों की फीस भी 70,500 से 90,000 रूपये के बीच तय की गई थी, लेकिन जैसे-जैसे कॉलेजों की संख्या बढ़ी सीटें भी खाली रहने लगीं।
कॉलेजों का प्रति छात्र खर्च भी कम हुआ। इस बार फीस निर्धारण कमेटी ने जहां फीस बढ़ाई हैं, तो वहीं कई ऐसे कॉलेज हैं जिनकी फीस कम भी हुई है।
इसलिए खाली रहने लगीं सीटें
उत्तर प्रदेश में प्राविधिक विश्वविद्यालय की स्थापना वर्ष 2000 में की गई। विश्वविद्यालय स्थापना के बाद प्रदेश में मात्र 41 निजी इंजीनियरिंग कॉलेज थे।
पर धीरे-धीरे यह संख्या 712 तक पहुंच गई। बड़ी संख्या में कॉलेज खुलने से प्रदेश में बीटेक की सीटें 1.35 लाख के आसपास हो गई।
इसके चलते प्रवेश लेने वाले छात्रों ने मनपसंद कॉलेज चुनना शुरू कर दिया और छोटे कॉलेजों की सीटें खाली रहने लगीं।