महंगी हो सकती है विश्वविद्यालयों में पढ़ाई
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राज्य के विश्वविद्यालयों में पढ़ाई महंगी हो सकती है। विश्वविद्यालयों की वित्तीय-प्रशासनिक मजबूती व फीस के ढांचे पर पुनर्विचार करने के लिए गठित कुलपतियों की समिति ने शासन को भेजी गई रिपोर्ट में 10 साल पुराने फीस स्ट्रक्चर में बदलाव किए जाने की जरूरत बताई है।
समिति ने विश्वविद्यालयों को गृहकर, जलकर, अनुरक्षण कर से मुक्त रखने व रियायती दर पर बिजली मुहैया कराए जाने की भी वकालत की है। समिति ने प्रधान कुलसचिव के पद के सृजन का यह कहते हुए विरोध किया है कि किसी विश्वविद्यालय के अधिनियम या नियमावली में ऐसे किसी पद की व्यवस्था नहीं है।
गौरतलब है कि जनवरी में मुख्यमंत्री ने कुलपतियों के सम्मेलन में प्रधान कुलसचिव के पद का सृजन किए जाने की बात कही थी।
समिति ने रिपोर्ट में कहा है कि राज्य विश्वविद्यालयों में लागू फीस की दरें 10 साल से भी अधिक पुरानी हैं। छठे वेतन मान के बाद विश्वविद्यालयों के वेतन पर होने वाले खर्च में बढ़ोतरी हुई है।
इन विश्वविद्यालयों की हालत खराब
शिक्षण कार्य में उपयोग होने वाली सामग्रियों मसलन चॉक, स्टेशनरी व अन्य चीजें भी महंगी हुई हैं। ऐसे में विश्वविद्यालयों में लिए जा रहे शैक्षिक शुल्क में बढ़ोतरी की जाए। रिपोर्ट में परीक्षा शुल्क भी बढ़ाए जाने की भी संस्तुति की गई है। इसके लिए उत्तर पुस्तिकाओं की कीमत, गोपनीय छपाई, उनकी ढुलाई व अन्य खर्चों में हुई बढ़ोतरी का हवाला दिया गया है।
समिति का कहना है कि लखनऊ विवि, गोरखपुर विवि और काशी विद्यापीठ की हालत सबसे खराब है। आवासीय परिसर होने की वजह से इन तीनों के खर्च बढ़ जाते हैं।
समिति के अध्यक्ष दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अशोक कुमार ने बताया कि पैसे की कमी से प्रयोगशालाओं के पुराने उपकरणों को दुरुस्त कराने, नए की खरीद, लाइब्रेरी के आधुनिकीकरण, कंप्यूटर केंद्रों की स्थापना, डिजिटल लाइब्रेरी हब, नए अनुसंधान केंद्रों के निर्माण के कार्य नहीं हो पा रहे हैं। पुराने भवनों की मरम्मत का कार्य भी प्रभावित हो रहा है।
समिति में ये थे शामिल
चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ के कुलपति प्रो. वीसी गोयल, बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झांसी केकुलपति प्रो. अविनाश चंद्र पांडेय, उच्च शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव और वित्त विभाग के प्रमुख सचिव सदस्य थे।
न बनाया जाए प्रधान कुलसचिव
लखनऊ में जनवरी में हुए कुलपति सम्मेलन में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने प्रधान कुलसचिव का पद बनाने की बात कही थी। समिति ने इसका विरोध किया है।
समिति ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि सहायक कुलसचिव के पदों को वर्तमान व्यवस्था के अनुसार पदोन्नति या सीधी भर्ती के माध्यम से तो उप कुलसचिव एवं संयुक्त कुलसचिव पदों को निचले संवर्ग से पदोन्नति के माध्यम से और कुलसचिव के 50 फीसदी पदों को सीधी भर्ती व 50 फीसदी को संयुक्त कुलसचिव की पदोन्नति के माध्यम से भरा जाए।
कहा गया कि प्रधान कुलसचिव की व्यवस्था किसी विश्वविद्यालय केअधिनियम या नियमावली में नहीं है। विदेशों में भी कुलसचिव की व्यवस्था है। यूजीसी में भी कुलसचिव पद ही है। इसलिए कुलसचिव शाखा में उच्चतम पद का नाम कुलसचिव ही रखा जाए।
यह भी दिए सुझाव
- विदेशी व एनआरआई छात्रों को आकर्षित करने वाले पाठ्यक्रम चलाए जाएं। इनमें विदेशी छात्रों को बिना प्रवेश परीक्षा के प्रवेश मिले। इनके लिए अलग से शुल्क निर्धारित हो।
- स्व वित्तपोषित रोजगारपरक व व्यावसायिक पाठयक्रम शुरू हों। जो कोर्स 5 वर्ष से अधिक समय से संचालित हो रहे हों उनकी आय का 20 फीसदी आकस्मिक निधि में रखने की व्यवस्था की जाए।
- विश्वविद्यालयों को छूट मिले कि वे कार्य परिषद की इजाजत से स्व वित्तपोषित पाठ्यक्रम शुरू कर सकें। शासन की अनुमति का इंतजार न कर केवल सूचना भर दी जाए।
- सेल्फ फाइनेंस कोर्स में काबिल शिक्षकों को नियमित शिक्षकों के बराबर वेतन केमानक बनें।
- व्यवसाय मेलों का आयोजन हो। इनमें फैशन डिजाइनिंग, मूर्तिकला, पेंटिंग कोर्सेज में किए गए कामों की प्रदर्शनी लगाई जाए। नर्सरी में विकसित पौधों, मधुमक्खी पालन से तैयार किए गए उत्पादों की प्रदर्शनी व बिक्री हो।
-आय बढ़ाने के लिए विश्वविद्यालयों में खाली पड़े स्थानों पर पौधरोपण व अन्य साधनों के इस्तेमाल की इजाजत हो।
- राज्य स्तरीय परीक्षाओं से होने वाली आमदनी का उपयोग आयोजक विश्वविद्यालय को करने की छूट हो। पेपरलेस कार्य को बढ़ावा दिया जाए।
- अनुबंध के आधार पर चार्टर्ड अकाउंटेंट रखे जाएं।
समिति के अध्यक्ष प्रो. अशोक कुमार ने कहा, 'वर्तमान व्यवस्था और भविष्य को ध्यान में रखते हुए संस्तुतियां की गई हैं। विश्वविद्यालय वित्तीय व प्रशासनिक रूप से मजबूत होंगे तो निश्चित रूप से उनका लाभ छात्रों व पूरे समाज को मिलेगा। इससे गुणवत्तापरक शिक्षा को बढ़ावा मिलेगा।'