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पिता ने लिया स्वर्गीय बेटे का मेडल, रो पड़ा IIM

Wed, 18 Mar 2015 03:57 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, काशीपुर
ब्यूरो/अमर उजाला, काशीपुर Updated Wed, 18 Mar 2015 03:57 PM IST
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father accepted his late son medal in IIM.

किसी भी संस्थान या अभिभावक के जीवन में ऐसा भावुक क्षण शायद न पहले आया होगा और ईश्वर करे कि न भविष्य में कभी आए। यह पल था आईआईएम काशीपुर के तीसरे दीक्षांत समारोह में मंगलवार को स्व भरत बंसल का स्नातकोत्तर डिप्लोमा प्रबंधन की उपलब्धि का सिल्वर मेडल उनके पिता मनमोहन बंसल को सौंपना।

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होनहार भरत की इसी जनवरी में मोटरसाइकिल दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी। श्री बंसल ने मंच पर अपने स्वर्गीय बेटे का मेडल स्वीकार किया तो तालियों तो बजीं, लेकिन गले रुंध गए और आंखें डबडबा आईं।
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सड़क पर व्याप्त अराजकता ने इस मेधावी छात्र को हमसे 31 जनवरी को छीन लिया। उस दिन तड़के भरत हॉस्टल नंबर एक से दो को जा रहा था कि उसकी बाइक सड़क पर खडे़ ट्रक से टकरा गई। गंभीर रूप से घायल भरत की बाद में मृत्यु हो गई।
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मंगलवार को दीक्षांत समारोह में मनमोहन बंसल जब अपने बेटे की उपाधि लेने मंच पर पहुंचे तो अपने आंसू नहीं रोक पाए और रो पड़े। संस्थान के डायरेक्टर ध्रुव साहनी के लिए भी ये बेहद भारी क्षण थे। वह भी अपने जज्बात जब्त नहीं कर सके और आंखें भीग ही गईं। सारा आडिटोरियम तालियों और दुख के बीच ‘फ्रीज’ सा हो गया।

छात्र के न रहने पर भी संस्थान देता है उपाधि

father accepted his late son medal in IIM.

भरत के पिता मनमोहन बंसल जयपुर निवासी हैं और उनका दुबई में कारोबार है। संस्थान के नियम हैं कि उपाधि योग्यता पर ही दी जाती है अब चाहे वह हमारे बीच न हो।

सिल्वर मेडल हासिल करने वाले दिवगंत छात्र भरत बंसल के साथ अनहोनी न हुई होती तो वह गोल्ड मेडल का हकदार था। आईआईएम के जनसंपर्क अधिकारी राजेश मिश्रा ने बताया कि अक्तूबर 2014 में हुए प्री कैंपस इंटरव्यू में उसका चयन लेटेंट व्यू कंपनी चेन्नई में हो गया था।

कंपनी ने उसकी काबिलियत को देखते हुए डिग्री हासिल करने से पहले ही 11 लाख का पैकेज दे दिया था। इस अनुबंध के बाद वह डिग्री हासिल करने के बाद कंपनी ज्वाइन करता।

मिश्रा के अनुसार भरत का निधन आईआईएम काशीपुर ही नहीं बल्कि पूरे कारपोरेट जगत के लिए एक भारी क्षति है। आईआईएम के प्रोफेसरों के मुताबिक भरत बेहद तेजतर्रार था। उसकी विश्लेषण इतना बारीक होता था कि जूनियर प्रवक्ता तक उससे किसी भी मुद्दे पर बहस करने से बचते थे।

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