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इंजीनियरिंग के बुरे दिन शुरु, कॉलेज पर लगा ताला
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून
Updated Fri, 08 Aug 2014 01:24 PM IST
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देहरादून में इंजीनियरिंग की ओर खत्म होते रुझान ने रंग दिखाना शुरू कर दिया है। कई साल से छात्रों की कमी से जूझ रहा खेड़ी शिकोहपुर, हरिद्वार स्थित हर्म्स कॉलेज पर आखिरकार ताला लग गया है।
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250 छात्रों को अन्य कॉलेजों में किया जाएगा शिफ्ट
यह कॉलेज से उत्तराखंड तकनीकी विश्वविद्यालय संबद्ध था। अब कॉलेज के करीब 250 छात्रों को अन्य कॉलेजों में शिफ्ट किया जाएगा। इनमें करीब 150 छात्र बीटेक के हैं।
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कॉलेज में शुरुआती दो तीन साल तो खूब छात्र आए लेकिन धीरे-धीरे यहां सन्नाटा छाने लगा। गत वर्ष कॉलेज में एक भी दाखिला न होने के बाद हालात और बिगड़ गए और इस साल कॉलेज ने यूटीयू से सीटों का एप्रूवल ही नहीं लिया।
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स्थिति यह थी कि बीते साल छात्रों की कक्षाएं भी नहीं हो पाईं। यूटीयू ने खुद ही छात्रों की फीस जमा कराके परीक्षा कराई थी। अब कालेज ने बंदी की घोषणा कर दी है।
विवि के परीक्षा नियंत्रक आरके सिंह ने बताया कि सभी छात्रों से विवरण मांगा गया है। कॉलेज में अध्ययनरत एमबीए, बीबीए, बीसीए, अन्य प्रोफेशनल कोर्स और बीटेक के छात्रों को 12 अगस्त से 14 अगस्त के बीच विवि बुलाया गया है।
कई और कॉलेज संकट में
सेलाकुई और आसपास स्थित कई और इंजीनियरिंग कॉलेज बंदी की कगार पर हैं। छात्र न आने की वजह से यह संस्थान भारी वित्तीय संकट का सामना कर रहे हैं।
इस बार भी बुरा हाल
उत्तराखंड में इंजीनियरिंग बुरे दौर से गुजर रही है। यूटीयू की पहली बीटेक काउंसिलिंग में 12500 सीटों के मुकाबले सिर्फ 1525 दाखिले इसका सुबूत हैं।
दरअसल इंजीनियरिंग में प्रवेश के लिए प्रदेश की अपनी कोई प्रवेश परीक्षा नहीं है। यूटीयू से संबद्ध कॉलेजों में दाखिले जेईई मेंस स्कोर के आधार पर होते हैं।
जेईई मेंस स्कोर देरी से मिलने के कारण इस बार काउंसिलिंग तब शुरू हुई जब अधिकतर छात्र दूसरे प्रदेशों में दाखिला ले चुके थे। वहीं, उत्तर प्रदेश खुद परीक्षा कराता है और इसीलिए वहां कोई संकट नहीं है।
वर्तमान में 30 हजार इंजीनियर्स के पद खाली हैं। लेकिन कुकुरमुत्तों की तरह खुले संस्थान इंडस्ट्री की डिमांड के मुताबिक छात्रों को तैयार नहीं कर पा रहे हैं। यह निजी संस्थान इंजीनियरिंग की समझ कम रखते हैं और टीचिंग स्टाफ को जरूरतों के हिसाब से प्रशिक्षित नहीं करते। प्रदेश में इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा ना होना भी बुरे दिनों की वजह है।
- नरेंद्र सिंह, इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियर्स उत्तराखंड चैप्टर के पूर्व चेयरमैन