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उत्तराखंड में सरकारी शिक्षा का 'बंटाधार'

Thu, 05 Feb 2015 01:30 PM IST
आफताब अजमत/ बिशन सिंह बोहरा, अमर उजाला, देहरादून
आफताब अजमत/ बिशन सिंह बोहरा, अमर उजाला, देहरादून Updated Thu, 05 Feb 2015 01:30 PM IST
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education in uttarakhand.

उत्तराखंड में उच्च से लेकर प्राइमरी स्तर तक की शिक्षा का बंटाधार हो रहा है। उच्च शिक्षा में मची अराजकता पर लगाम लगाने के हाईकोर्ट के आदेश के बाद राज्य के छात्रों के लिए ‘सांध्यकालीन कक्षाओं’ का गैरकानूनी विकल्प देने से हजारों छात्रों का भविष्य दांव पर लग गया है।

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शिक्षा महकमा भी कम अलबेला नहीं है। रस्मअदायगी के नाम पर एक-एक कमरे में सरकारी महाविद्यालय खोल दिया गया। एक और मोर्चे पर इसका विरोधाभास देखिए। सरकारी स्कूलों में भवन, बेंच-कुर्सी जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं हैं तो दूसरी ओर शिक्षकों से जुड़े एक-एक मुकदमे की पैरवी में लाखों फूंके जा रहे हैं।
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उत्तराखंड सरकार ने ताबड़तोड़ नए महाविद्यालयों की घोषणाएं तो कीं, लेकिन जमीन पर इनका क्या हाल है, यह देखने की सुध न सरकार को है, न अधिकारियों को। स्थिति यह है कि गत वर्ष (शैक्षिक सत्र 2014-15) खुले 17 नए महाविद्यालयों में कुछ एक-एक कमरे में चल रहे हैं तो कुछ विधायक निधि से बनाए गए टिन शेड में।
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सिर्फ नाम के इन महाविद्यालयों में न बुनियादी संसाधन मौजूद हैं, न छात्रों को पढ़ाने के लिए शिक्षक। प्राथमिक विद्यालयों से भी बदतर ये महाविद्यालय उच्च शिक्षा के नाम पर मजाक बनकर रह गए हैं।

कागजों पर खानापूर्ति
उच्च शिक्षा सूत्रों की मानें तो गत वर्ष नैनीताल उच्च न्यायालय ने शिक्षा की बदहाली पर सरकार को कड़े निर्देश दिए तो प्रदेश सरकार में नए महाविद्यालय खोलने की होड़ सी लग गई।

उच्च न्यायालय को यह दिखाने की कोशिश की गई कि मौजूदा महाविद्यालयों से छात्र संख्या का बोझ कम करने के लिए नए महाविद्यालय खोले जा रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक कागजों पर इन महाविद्यालयों का आंकड़ा दिखाकर सरकार खुद की पीठ थपथपा रही है, लेकिन यहां संसाधन जुटाने के लिए कोई कदम नहीं उठाया जा रहा।

गुरुजी, कॉलेज असली तो है ना?
डीएवी कॉलेज की व्यवस्था पर उठे सवाल के बाद रायपुर में नया महाविद्यालय खोला गया है। जरा इसका हाल जानते चलें। फल एवं सब्जी संग्रह केंद्र के तीन कमरों में यह राजकीय महाविद्यालय चल रहा है। एक कमरा प्राचार्य कार्यालय है और दूसरा स्टाफ रूम।

तीसरे और आखिरी कमरे में बीए और बीकॉम के साठ छात्रों की कक्षाएं साथ चलती हैं। महाविद्यालय की यह हालत देख कई बार अभिभावक भी अध्यापकों से पूछ बैठते हैं, गुरुजी यह कॉलेज असली तो है ना? कहीं फर्जी तो नहीं?

अन्य कॉलेजों का भी हाल बुरा

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गढ़वाल मंडल
रायपुर (देहरादून): तीन कमरे, एक प्राचार्य कार्यालय, एक स्टाफ रूम, एक कक्षा जिसमें बीए व बीकॉम की कक्षाएं चलती हैं, करीब 80 छात्र हैं।

मंगलौर (हरिद्वार): दो छोटे-छोटे कमरे हैं, चलने वाली हालत नहीं है।
मरगूबपुर (हरिद्वार): तीन कमरों में चल रहा है।
घाट (चमोली): दो कक्षों में चल रहा है।
चुड़ियाला (हरिद्वार): इंटर कॉलेज की ओर से दिए हुए पांच कमरों में संचालन।

पोखरी, पट्टी कोइली (टिहरी): चार कमरे हैं, करीब 50 छात्र हैं।
गर्ल्स कालेज खानपुर (हरिद्वार): एक कमरे में चल रहा है।

कुमाऊं मंडल
देवीधूरा (चंपावत): दो कक्षों में संचालित हो रहा है।
बनबसा (चंपावत): स्वास्थ्य विभाग के आवासीय भवन में चल रहा है।
भतरौंजखान (अल्मोड़ा): किराये की बिल्डिंग है, यहां व्यवस्था थोड़ी ठीक है।
सल्ट तल्ला (अल्मोड़ा): नाममात्र का कॉलेज है, प्राचार्य के अलावा कोई स्टाफ नहीं।

सितारगंज (ऊधमसिंह नगर): कॉलेज भवन निर्माणाधीन, 50 छात्र-छात्राएं अध्ययनरत।
मुवानी (पिथौरागढ़): तीन कक्षों में चल रहा है कॉलेज।
बेतालघाट (नैनीताल): चलताऊ हालात में है।
माफी (अल्मोड़ा): बेहद कम सुविधाओं में चल रहा कॉलेज।

लामबगड़ (अल्मोड़ा): बेहद कम सुविधाएं और कम स्थान।
गनाई गंगोली (पिथौरागढ़): विधायक निधि से कामचलाऊ शेड बनाई गई, यहां कॉलेज चल रहा है।

शिक्षा में भी चुनावी खेल

प्रदेश सरकार ने गत वर्ष कुल 20 महाविद्यालय खोलने की घोषणा की थी। लेकिन उच्च शिक्षा के नाम पर किए इस निर्र्णय पर भी राजनीति हावी रही।

मुख्यमंत्री हरीश रावत का गृहक्षेत्र अल्मोड़ा है, जबकि हरिद्वार से वह सांसद रहे। दोनों जिलों को चार-चार महाविद्यालय मिले। गढ़वाल मंडल में नौ में से सात, जबकि कुमाऊं में 11 में से दस महाविद्यालय खुल चुके हैं।

इस साल इनकी घोषणा
प्रदेश सरकार ने हाल में पांच नए महाविद्यालयों की शुरुआत की घोषणा की है। इनमें गढ़वाल मंडल में कोटद्वार भाबर, पौड़ी के ब्रह्मखाल और उत्तरकाशी के डुंडा में महाविद्यालय खोलने की तैयारी है, जबकि कुमाऊं में दुर्ग नागुरी और बागेश्वर में कालेज खोले जाने हैं। खास बात यह है कि इन महाविद्यालयों को सत्र 2015-16 से ही शुुरू करने का दावा किया गया है।

महाविद्यालयों की समस्या हमारी जानकारी में है। कुछ अधिकारियों की समिति बनाई है, जो हर महाविद्यालय का निरीक्षण करेगी। अभी समिति उच्च शिक्षा निदेशालय संग महाविद्यालयों की समस्याओं पर रिपोर्ट बना रही है। जल्द ही शासन स्तर पर बैठक कर दिक्कतें दूर की जाएंगी।
- राधिका झा, सचिव, उच्च शिक्षा

फर्नीचर का बजट नहीं, मुकदमे की पैरवी के दो लाख

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‘सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई है। वकील को फीस देनी है, जल्दी सवा दो लाख का बजट जारी करो।’ यह बात टाटा, बिड़ला, अंबानी जैसा कोई बड़ा उद्योगपति नहीं, बल्कि शिक्षा विभाग के वे अधिकारी अकसर करते हैं, जिनका दायित्व सरकारी स्कूलों की दशा सुधारना है।

स्थिति यह है कि 1117 स्कूलों में बच्चों के लिए पेयजल और 3289 स्कूलों में बिजली नहीं है, जबकि सर्द मौसम में फर्नीचर न होने से बच्चे ठंडे फर्श पर बैठने के लिए मजबूर हैं। जब भी इन सुविधाओं की बात होती है तो महकमा बजट का रोना रोने लगता है, लेकिन मुकदमों की सुनवाई पर हर साल करोड़ों रुपए खर्च किए जा रहे हैं।

7 हजार मुकदमे लंबित
शिक्षकों की भर्ती, संकुल संदर्भ व्यक्ति (सीआरपी), खंड संदर्भ व्यक्ति (बीआरपी), बीटीसी प्रशिक्षितों की नियुक्ति, शिक्षकों की पेंशन, तबादले आदि मामले। जानकारी के मुताबिक विभिन्न अदालतों में ऐसे सात हजार से अधिक मुकदमे लंबित हैं।

65 लाख हर्जाना दिया, फिर भी नहीं सुधरे

शिक्षा विभाग पर दर्ज हुए ये मुकदमे दरअसल, अधिकारियों की ही लापरवाही का नतीजा हैं, ऐसा विभाग के ही सूत्र बताते हैं। कायदे-कानूनों की अनदेखी की वजह से ही मुकदमे होते हैं।

कुछ ही समय पूर्व शिक्षा विभाग को संकुल संदर्भ व्यक्ति (सीआरपी), खंड संदर्भ व्यक्ति (बीआरपी) की गलत तैनाती के मामले में 65 लाख रुपये हर्र्जाना देना पड़ा था। लेकिन इसके बाद भी नीति बनाए बिना कुछ सीआरपी, बीआरपी को मूल तैनाती में भेजने का निर्देश दे दिया गया। मामला फिर अदालत में है।

उच्चतम न्यायालय में पक्ष मजबूत करने के लिए अच्छा वकील करना होता है। बड़े वकील हर सुनवाई पर सवा दो लाख रुपए तक शुल्क लेते हैं, तो देना ही पड़ता है। छोटी अदालतों का खर्चा अलग है। कोर्ट में इतने मामले हैं कि हम खुद परेशान हैं।
- सीमा जौनसारी, शिक्षा निदेशक

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