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सीटों की सौदेबाजी में फंसा स्टूडेंट्स का भविष्य

Mon, 09 Dec 2013 01:56 AM IST
आशीष त्रिवेदी/लखनऊ
आशीष त्रिवेदी/लखनऊ Updated Mon, 09 Dec 2013 01:56 AM IST
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big game in affiliation of colleges in uptu

यूपीटीयू में बिना संबद्धता के ही कॉलेजों को करीब डेढ़ हजार सीटों पर दाखिले की छूट दे दी गई। सीट की सौदेबाजी करने वालों को हड़बड़ाहट इतनी थी कि उन्होंने विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद से संबद्धता के पत्र का भी इंतजार नहीं किया।

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दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट ने मई 2013 के बाद संबद्धता देने पर रोक लगा दी थी। शासन की जिस कमेटी ने इसे संबद्धता देने की संस्तुति की उसने यह काम बाद में किया।
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ऐसे में लखनऊ व पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक भी कॉलेज को संबद्धता पत्र जारी नहीं हुआ कि उसे कितनी सीटों पर दाखिला लेना है और किन-किन कोर्स में सीटें बढ़ाकर दाखिला लेंगे।
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पूरा खेल मौखिक आदेश पर ही हो गया। अब संबद्धता के प्रकरण पर न्याय विभाग द्वारा आपत्ति लगाए जाने के बाद हड़कंप मचा हुआ है।

महामाया टेक्निकल यूनिवर्सिटी (एमटीयू) जिसका अब यूपीटीयू में विलय हो गया है उससे संबद्ध 36 कॉलेजों को संबद्धता दी गई है। यह खेल सबसे ज्यादा नोएडा व आसपास के जिलों में खेल गया।

फिलहाल जांच में जो बिन्दु उभरकर सामने आ रहे हैं उनके अनुसार पूर्ववर्ती जीबीटीयू जिससे लखनऊ सहित पूर्वी उत्तर प्रदेश के इंजीनियरिंग कॉलेज पहले संबद्ध थे वहां 8 कॉलेजों को संबद्घता दी गई।

इस तरह कुल 44 कॉलेजों में बिना संबद्धता के ही डेढ़ हजार से लेकर दो हजार के बीच सीटों पर मौखिक आदेश से दाखिले की छूट दे दी गई।

इसमें तीन नए इंजीनियरिंग कॉलेज के अलावा बाकी सभी इंजीनियरिंग कॉलेजों में नया कोर्स चलाने, पहले से चल रहे बीटेक, बीफॉर्मा व मैनेजमेंट कोर्सों की सीटों की संख्या में बढ़ोत्तरी करने की छूट दी गई है।

अब यह पूरा खेल खुलने के बाद कुलपति डॉ. आरके खांडल ने अरुणाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. जीएन पांडेय की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय कमेटी बना दी है।

साथ ही रजिस्ट्रार यूएस तोमर को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। क्योंकि राज्य संबद्धता कमेटी में प्रमुख सचिव प्राविधिक शिक्षक अध्यक्ष हैं और यूपीटीयू के कुल सचिव यूएस तोमर सचिव हैं।

फंसे तो कुलपति के पाले में फेंकी गेंद
बिना संबद्धता के ही दाखिला देने का खेल जब उजागर हुआ तो गेंद कुलपति के पाले में फेंकने की कोशिश की गई। शासन की ओर से पत्र आया कि न्याय विभाग ने संबद्धता पर आपत्ति जताई है।

ऐसे में जिन कॉलेजों में स्टूडेंट्स को दाखिला दिया गया उनके भविष्य के बारे में आप क्या निर्णय लेंगे। क्योंकि फर्स्ट सेमेस्टर की परीक्षाएं 21 दिसंबर से शुरू हो रही हैं और मामला फंसने पर छात्रों के बवाल करने की आशंका थी।

जबकि शासन स्तर पर संबद्धता का अप्रूवल देने के बाद कॉलेजों को संबद्धता देने का पत्र कार्य परिषद की संस्तुति पर ही जारी किया जाता है।

ऐसे में कुलपति डॉ. आरके खांडल ने पत्र लिखा कि जब आपने अपने स्तर पर ही संबद्धता की छूट दी है तो आप ही इस मसले पर कोई दिशा-निर्देश दें।

सेलेक्शन कमेटी से कुलपति को किया बाहर
यूपीटीयू में कुलपति सिर्फ कठपुतली बनकर रह गए हैं। सारा काम शासन और रजिस्ट्रार ही करते हैं। अभी अक्तूबर में ही कुलपति को सेलेक्शन कमेटी से बाहर कर उनकी जगह प्रमुख सचिव प्राविधिक शिक्षा को अध्यक्ष बना दिया गया।

जबकि राजधानी स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी (आईईटी) सहित करीब चार इंजीनियरिंग कॉलेजों में निदेशक पद पर इंटरव्यू 17 से 20 दिसंबर के बीच होने हैं।

इसके अलावा फीस निर्धारण कमेटी, प्रवेश निर्धारण कमेटी, राज्य संबद्धता कमेटी व संस्थान की उपयोगिता समिति सहित करीब आधा दर्जन से अधिक कमेटी से बीते वर्षों में धीरे-धीरे कुलपति को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। अब यूपीटीयू में कोई भी महत्वपूर्ण फैसला उनके हाथ नहीं होता।

संबद्धता ही नहीं फीस निर्धारण में भी खेल
संबद्धता ही नहीं फीस निर्धारण भी खेल होता है। इस्लामिक एकेडमी ऑफ एजुकेशन व अन्य बनाम कर्नाटक राज्य के फैसले में खुद न्यायालय ने राज्य के मुख्य न्यायाधीश द्वारा नामित उच्च न्यायालय के दो सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में कमेटी बनाने का निर्देश दिया था।

27 जून 2008 को शासन की ओर से जारी पत्र में कहा गया कि यह राज्य द्वारा अपनाई जाने वाली अस्थायी व्यवस्था थी। स्थाई व्यवस्था के तहत जो कमेटी बनायी गई उसमें प्रमुख सचिव/सचिव प्राविधिक शिक्षा को पदेन अध्यक्ष और वित्त विभाग के विशेष सचिव व यूपीटीयू के रजिस्ट्रार को पदेन सदस्य बनाया गया।


इसमें कुलपति को शामिल ही नहीं किया गया। इस वर्ष जुलाई में कुलपति डॉ. आरके खांडल ने शासन को पत्र लिखकर पूछताछ की लेकिन कोई जवाब नहीं आया। सूत्रों की मानें तो एक इंस्टीट्यूट की फीस तय करने में 20 प्रतिशत फीस लेने पर सौदा तय होता है।

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