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गजब है! पंजाब में ही पंजाबी बोलने पर पाबंदी

Tue, 30 Dec 2014 12:24 PM IST
सुरजीत सिंह सत्ती/अमर उजाला, चंडीगढ़
सुरजीत सिंह सत्ती/अमर उजाला, चंडीगढ़ Updated Tue, 30 Dec 2014 12:24 PM IST
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Ban on Speaking Punjabi in Convent Schools of Punjab

पंजाब सरकार के निर्देश के बावजूद प्रदेश के कुछ कान्वेंट स्कूलों ने छात्रों के पंजाबी में बातचीत करने पर पाबंदी लगा रखी है। कान्वेंट स्कूलों के इस रवैये पर पंजाब जागृति मंच ने अब केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय के सचिव और काउंसिल फार इंडियन स्कूल सर्टिफिकेट एग्जामिनेशन (सीआईएससीई) को कानूनी नोटिस भेजकर चेतावनी दी है कि यदि 30 दिन में कान्वेंट स्कूलों में पंजाबी में बोलचाल से पाबंदी नहीं हटाई गई तो संस्था हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर करके इसे चुनौती देगी।

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पंजाब जागृति मंच के सतनाम सिंह मानिक ने एडवोकेट एचसी अरोड़ा के माध्यम से नोटिस भेजकर मंत्रालय और काउंसिल से कहा है कि जालंधर के सेंट जोसफ सीनियर सेकेंडरी स्कूल, डिफेंस कालोनी और सेंट जोसफ कान्वेंट स्कूल, केंटोन मेंट ने छात्रों के पंजाबी में बातचीत करने पर पाबंदी लगा रखी है। यह दोनों स्कूल सीआईएससीई से जुड़े हैं। ताजा प्रास्पेक्टस में इन स्कूलों ने इस नियम को एक शर्त के तौर पर शामिल कर रखा है।
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कान्वेंट और निजी स्कूलों में छात्रों के मातृभाषा में बातचीत पर पाबंदी लगाने के खिलाफ पंजाब सरकार को मांग पत्र भेजा गया था। इस पर प्रतिक्रिया करते हुए प्रमुख सचिव (स्कूली शिक्षा) ने डायरेक्टर स्कूल एजूकेशन को पाबंदी हटवाने का निर्देश भी जारी किया था।
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मंच ने नोटिस के जरिए मांग की है कि पंजाब में सीआईएससीई के स्कूलों में मातृभाषा के इस्तेमाल पर पाबंदी हटाई जाए। दूसरे, पंजाब में अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाने संबंधी निर्देश जारी किए जाएं। इसके साथ ही चेतावनी भी दी गई है कि यदि 30 दिन के भीतर नोटिस पर कार्रवाई नहीं की गई तो हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की जाएगी।

यूएनओ ने मातृभाषा को माना है मानवाधिकार
नोटिस में कहा गया है कि बावजूद इसके काउंसिल से जुड़े कुछ स्कूल छात्रों को उनकी मातृभाषा में बातचीत करने से रोक रहे हैं। नोटिस में इस बात का भी हवाला दिया गया कि यूएनओ ने मातृभाषा को मानवाधिकार माना है।

यह भी कहा गया है कि यूनिवर्सिटी ऑफ ढाका के छात्रों व अन्य एक्टिविस्ट्स ने बांग्लादेश में उर्दू को राष्ट्रीय भाषा घोषित करने का विरोध किया था। वह अपनी मातृ भाषा को राष्ट्र भाषा घोषित करवाना चाहते थे।


आंदोलन में कुछ एक्टिविस्ट्स मारे गए थे। उस वक्त 21 फरवरी 1952 को यूएन ने एक प्रस्ताव पारित कर इस दिन को अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के तौर पर मनाने का ऐलान किया था।

नोटिस में कहा गया है कि भारत सरकार और राज्य सरकारों ने मातृभाषा के प्रति सहानुभूति के रूप में यह दिवस अभी तक मनाना शुरू नहीं किया।

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