बहुत खास होगी यहां की पहली एल्यूमनाई मीट
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प्रदेश के पहले और इकलौते गवर्नमेंट आर्किटेक्चर कॉलेज में शनिवार को पहली
देश को नामी आर्किटेक्ट देने वाले इस संस्थान का इतिहास 102 साल पुराना है।
इस संस्थान की स्थापना 1911 में मिनिस्ट्री ऑफ कल्चरल अफेयर्स, उत्तर प्रदेश के अंतर्गत ‘डिपार्टमेंट ऑफ आर्किटेक्चर’ के रूप में की गई। तब यह ‘गवर्नमेंट कॉलेज ऑफ आर्ट्स एंड क्राफ्ट’ का हिस्सा था।
वर्ष 1976 तक यह आर्ट्स एंड क्राफ्ट कॉलेज में एक विभाग की तरह चलता रहा। वर्ष 1976 में इसे आर्ट्स कॉलेज से अलग करके इंडीपेंडेंट कॉलेज कर दिया गया।
तभी इसे ‘गवर्नमेंट कॉलेज ऑफ आर्किटेक्चर’ का दर्जा मिला। उस समय कॉलेज में सिर्फ डिप्लोमा कोर्स ही हुआ करते थे। किसी यूनिवर्सिटी से संबद्ध न होने की वजह से यहां डिग्री प्रोग्राम नहीं चल सकते थे।
...और पूरा हुआ डिग्री कोर्स का सपना
आर्किटेक्चर
में डिग्री कोर्स की चाह रखने वाले लोगों का सपना पूरा हुआ वर्ष 1980 में।
इस वर्ष कॉलेज को लखनऊ विश्वविद्यालय से संबद्ध किया गया और बैचलर ऑफ
आर्किटेक्चर कोर्स की शुरूआत हुई।
उस समय पूरे देश में 12-13 ही सरकारी
आर्किटेक्चर कॉलेज हुआ करते थे। लखनऊ के इस कॉलेज में डिग्री कोर्स शुरू
होने से बहुत से स्टूडेंट्स को राहत मिली। उस समय कॉलेज में बीऑर्क की 30
सीटें हुआ करती थीं। हालांकि वर्तमान में यहां 40 सीटें हैं।
यहीं के छात्र ने दिया हजरतगंज को नया रूप
इस
कॉलेज के छात्र-छात्राएं अब तक कई जगह अपना परचम लहराकर चुके हैं। कॉलेज
से 91 बैच के पास आउट छात्र आशीष श्रीवास्तव जैसलमेर का किला, खजुराहो की
गुफाएं, नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जन्मस्थली पर म्यूजिम सहित कई बड़े
प्रोजेक्ट पर काम कर चुके हैं।
हजरतगंज का वर्तमान रूप भी आशीष श्रीवास्तव
का ही डिजाइन किया हुआ है। इस समय वे गोमती नदी के किनारे 15 किलोमीटर
क्षेत्र के सौंदर्यीकरण और मेंटेनेंस का प्रोजेक्ट कर रहे हैं।
2012 में
उनको यूनेस्को की ओर से आर्किटेक्चर के क्षेत्र का अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार
दिया गया। 2012 में ही उनको हजरतगंज के रेनोवोशन के लिए आर्किटेक्चर ऑफ द
इयर से नवाजा गया।
फेसबुक ने बनाया रास्ता
आर्किटेक्चर
कॉलेज में जब एल्यूमनाई एसोसिएशन के गठन की बात शुरू हुई तो सबसे बड़ी
समस्या जो सामने आई वह थी सालों पुराने स्टूडेंट्स को ढूंढना।
क्योंकि
कॉलेज में उपलब्ध इन स्टूडेंट्स के रिकॉर्ड में दर्ज बहुत से पते और संपर्क
बदल चुके थे। इस समस्या का समाधान किया सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट फेसबुक
ने। एल्यूमनाई एसोसिएशन के अध्यक्ष मो. सबाहत ने बताया कि उन्होंने
एल्यूमनाइज के नाम से उनको फेसबुक पर ढूंढना शुरू किया।
इसके बाद एक के
अकाउंट से दूसरे और फिर तीसरे अकाउंट करते हुए बहुत से एल्यूमनाइज से जुड़
गए। मो. सबाहत ने बताया कि उन्होंने फेसबुक के माध्यम से ही लगभग 600
एल्यूमनाइज से संपर्क स्थापित किया। इसके बाद इनके माध्यम से बाकी अन्य
एल्यूमनाई भी संपर्क में आए।