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बिहार में बाढ़ प्रभावित चूहे खाने को मजबूर

Mon, 08 Aug 2016 07:18 PM IST
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, दिल्ली
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, दिल्ली Updated Mon, 08 Aug 2016 07:18 PM IST
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Bihar Flood Survivors Started Eating Rats
- फोटो : indiatimes.com

बिहार के सहरसा से करीब पचास किलोमीटर दूर के कई गांव टापू बन गए हैं। बरसात में कोसी नदी उनके लिए दरिया में तब्दील हो गई है। चारों तरफ पानी और तबाही के निशान नजर आते हैं। न खाने को कुछ है, न पीने के लिए साफ पानी। बाढ़ पीड़ितों की रोजमर्रा की जिंदगी नर्क सरीखी हो गई है। अन्न का एक दाना नहीं है। पानी से घिरे उन लोगों को पेट की आग झुलसाती है। स्थानीय और सरकारी मदद कोसी की बाढ़ में कोसों दूर है। आखिर, वे चूहे खाकर पेट की आग बुझा रहे हैं। गरीबी-मुफलिसी और तबाही के मंजर में कुछ लोग ऐसे हैं जो 40 रुपए किलो चूहे खरीदकर खा रहे हैं।

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गौरी देवी सबेरे नौ बजे इंतजार करती हैं कि उनका 5 वर्षीय बेटा चूहे ला रहा होगा। पानी से घिरे लोगों के पास खाने के लिए चूहों के सिवा कोई भोजन नहीं है। सैकड़ों गांव उफनाती कोसी की चपेट में हैं। बनाही टोला गांव नें पीने का पानी भी नहीं है। गौरी देवी बताती हैं कि बाढ़ के कारण बाजार जाने वाले सभी रास्ते जलमग्न हैं। अन्न-अनाज का जुगाड़ है नहीं, इसलिए चूहे खाना ही जिंदा रहने का एकमात्र उपाय है।
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गौरी देवी और अन्य गांव वाले दलित मूसाहर समुदाय से आते हैं और बेहद गरीब हैं। पहले से मुफलिसी झेल रहे इन लोगों की जिंदगी को बाढ़ ने एकदम नरक बना दिया है। सरकार की तरफ से इनके लिए कोई राहत नहीं है। चारों तरफ पानी ही पानी होने की वजह से लोगों के पास चूहे खाने के सिवा कोई उपाय नहीं है। और कुछ लोग बाकायदा चूहा पकड़ने का कारोबार करने लगे हैं। कई गांव वाले चूहे पकड़ने में उस्ताद हो गए हैं, वे चूहे पकड़ते हैं और जरूरतमंदों को बेच देते हैं।

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40 रुपए किलो मिलते हैं चूहे

Bihar Flood Survivors Started Eating Rats

बेचान सादा ऐसे ही चूहों के शिकारी हैं। बेचान रोजाना करीब 12 किलो चूहे पकड़ लेते हैं और 40 रुपए किलो के भाव से बेच देते हैं।

बेचान के मुताबिक मॉनसून में चूहें जमीन से बाहर निकलते हैं और नई जगह ढूढ़ते हैं, तभी वह उनका शिकार करते हैं।

इंडिया टाइम्स की खबर के मुताबिक मॉनसून के सीजन में बनाही टोला गांव राज्य के बाकी हिस्सों से कट जाता है, वहां तक पहुंचने के लिए लोगों को दलदल से होकर गुजरना होता है। यह इलाका कोसी नदी के पूर्वी और पश्चिमी तटबंधों के बीच का है। मॉनसून के दौरान यहां आने-जाने के लिए नांव का ही सहारा है। बाढ़ में नांव से कुछ किलोमीटर की दूरी तय करने में ही घंटों का वक्त लगता है।

'सरकार की तरफ से राहत नहीं मिल रही है'

Bihar Flood Survivors Started Eating Rats

गांव में कोई शौचालय नहीं है और लोग खुले में शौच जाते हैं। वहां कोई बिजली नहीं है। गांव के ज्यादातर हैंडपम्प काम नहीं कर रहे हैं। साफ पानी पीने कोई जरिया नहीं है।

गांव के मुखिया कलार साडा बताते हैं कि गांव कोसी नदी के इलाके में पड़ता है। इसलिए जब भी ज्यादा बारिश होती है, गांव चारों ओर से पानी से घिर जाता है।

मुखिया के मुताबिक ब्लॉक डिवेलपमेंट ऑफिसर ने हर पीडीएस दुकानों पर अनाज मुहैया कराने का आदेश दिया है, लेकिन लोगों को कोई राहत नहीं मिल रही है।

जिला मजिस्ट्रेट हालात से बेखबर

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सहरसा जिले के मजिस्ट्रेट विनोद सिंह गुंजियाल ने जानकारी न होने की बात कही और कहा मीडिया ने उन्हें जो जानकारी दी है, वह उसकी जांच कराएंगे।

इलाके के कोसी के पश्चिमी और पूर्वी तटबंधों के बीच में पड़ने के कारण पानी का बहाव हमेशा बना रहता है। 

गुंजियाल की मानें तो सरकार ने इस इलाके के लोगों जमीन मुहैया कराई थी, लेकिन इन लोगों ने इलाका छोड़ने से इनकार कर दिया था। उनका मानना था कि उनके इलाके की जमीन बहुत उपजाऊ है।

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