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राजस्थान के आदिवासियों ने बिना मदद किया अनोखा कारनामा, पढ़िए एक जिद कैसे पूरी हुई
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Tue, 04 Sep 2018 10:59 PM IST
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राजस्थान का आदिवासी बहुल जिला डूंगरपुर। यहां के लोगों ने नगर परिषद के आग्रह पर एक जिद कर ली और जिद भी क्या थी कि बिना किसी सरकारी मदद के शहर से साठ फीसदी बीमारियों को भगाना है। अब जनता तो जनता ठहरी, जब बात जिद की थी तो पूरा शहर नगर परिषद के साथ खड़ा हो गया। महज दो साल लगे जिद को पूरा करने में।
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नतीजा, डूंगरपुर से अब साठ फीसदी बीमारियां गायब हो गई हैं। बरसात के सीजन में मलेरिया और डेंगू से पीड़ित मरीजों की कतारें अब नहीं दिखती हैं। पिछले दो साल से शहर में डेंगू का एक भी केस नहीं आया।
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डूंगरपुर को स्वच्छता अभियान के सर्वे में देशभर में नंबर वन पर लाने की जिद करने वाले नगर परिषद के सभापति के.के. गुप्ता बताते हैं कि यह काम आसान नहीं था। समाज में हर तरह के लोग रहते हैं। सबकी अपनी सोच है, अपने रीति-रिवाज हैं। 2016 में जब स्वच्छता अभियान चलाया गया तो ज्यादा लोग साथ नहीं आए। कुछ की सोच रही कि हमें क्या मतलब है। हम अपना घर तो साफ करते ही हैं। उनकी इस सोच को बदलने में नगर परिषद को पांच-सात महीने लग गए। इसमें स्कूली बच्चों को शामिल किया गया।
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साफ-सफाई को लेकर अनेक योजनाएं चलाई गईं और जागरूकता अभियान शुरू हुए। इसके बाद जब लोगों को लगा कि यह सब तो उनके अपने फायदे के लिए ही है तो वे आगे आए और इस तरह आगे आए कि उन्होंने नगर परिषद के आहृवान पर एक जिद कर ली कि शहर से बीमारियों को भगाना है। बस यहीं से शुरू होती है सफलता की एक नई कहानी। शहर की सड़कों और गलियों में कूड़े के नाम पर कागज भी देखने को नहीं मिलते तो पानी एकत्रित होने का मतलब ही नहीं।
नगर परिषद के आयुक्त गणेशलाल खराडी का कहना है कि जब इस मुहिम में बच्चों और महिलाओं ने भाग लेना शुरू किया तो शहर की फिजा बदलते देर नहीं लगी। लोगों ने कसम खा ली कि अपने घर के आसपास ही नहीं, बल्कि किसी भी सार्वजनिक स्थल पर गंदगी नहीं फैलने देंगे। पानी इकट्ठा नहीं होने देंगे, यदि कोई व्यक्ति बाजार जा रहा है तो उसने बीच राह में अपनी जिम्मेदारी निभाई।
कूड़ा पड़ा है तो उसे उठाया और दूसरों को भी समझाया। इसी तरह एक चेन बनती चली गई। महिलाएं सब्जी लेने जाती हैं तो स्वच्छता अभियान का संदेश साथ लेकर जाती हैं। बच्चों ने भी अपने स्तर पर स्वच्छता को इस तरह अपना लिया है जैसे वे अपने खेल या खाने-पीने को लेते हैं। वे पूरी तन्मयता के साथ इस अभियान से जुड़ गए हैं। अब सोचिये, ऐसे में बीमारियां कहां से और कैसे आ पाएंगी।
दो साल से डेंगू का एक भी केस नहीं- सीेमओ
डूंगरपुर के मुख्य चिक्त्सिा अधिकारी (सीएमओ) डॉक्टर महेंद्र परमार का कहना है कि शहर में पहले कई जगहों पर पानी एकत्रित हो जाता था। कूड़ा भी बिखरा रहता था, लेकिन अब वह समस्या पूरी तरह खत्म हो गई है। जब पानी एकत्रित नहीं हो रहा है तो लारवा पैदा नहीं होता जिससे मच्छर नहीं पनपते। दो साल पहले बरसाती सीजन में मलेरिया और इससे जुड़ी दूसरी बीमारियों के रोजाना तीन-चार सौ मरीज आते थे, अब वह संख्या घटकर महज सौ के आसपास रह गई है।
मलेरिया, डेंगू और हैजा जैसी बीमारियों के मरीजों की संख्या अब करीब तीस-चालीस फीसदी ही बची है। इनमें भी अधिकांश मरीज ग्रामीण तबके के हैं। कुछ लोग जो गुजरात या दूसरी जगहों से काम की तलाश में यहां आते हैं, वे ही इन बीमारियों की चपेट में आते हैं। डूंगरपुर शहर में खतरनाक मलेरिया या डेंगू का एक भी केस नहीं आया है।
स्वास्थ्य विभाग को फॉगिंग कराने या गड्ढों में भरे पानी में तेल डालना पड़ता था। इसके लिए बाहर से अतिरिक्त कर्मियों की सेवा ली जाती थी, अब वह सब खत्म हो गई है। लोगों को कहीं थोड़ा बहुत पानी भरा दिखता है तो वे खुद ही गड्ढा भर देते हैं नहीं तो तुरंत नगर परिषद को सूचना दे देते हैं। चंद मिनटों में नगर परिषद के कर्मी वहां पहुंचकर गड्ढा भर देते हैं।
नगर परिषद के भवन में दी जाती है निशुल्क कोचिंग
नगर परिषद के उपसभापति फकरूद्दीन का कहना है कि ऐसा देश में कहीं अन्य जगह पर देखने को नहीं मिलेगा। डूंगरपुर के बच्चों को नगर परिषद अपने दफ्तर में निशुल्क कोचिंग देती है, चूंकि प्राइवेट कोचिंग महंगी है, इसलिए परिषद ने खुद के भवन में कोचिंग देनी शुरू कर दी है। सुबह दस बजे से दोपहर दो बजे तक और शाम को ढाई बजे से साढे़ छह बजे तक कोचिंग चलती है। एक बैच में करीब दो सौ विद्यार्थी आते हैं। यहां से कोचिंग लेने वाले बच्चे राजस्थान सिविल सर्विस के अलावा पुलिस, एसएससी व दूसरी श्रेणी की नौकरियों में जा रहे हैं।