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हौसले की पतवार से पार की मझधार
ब्यूरो/अमर उजाला, आगरा
Updated Thu, 17 Jul 2014 03:55 PM IST
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पिता ने देश के लिए अपनी जान न्यौछावर कर दी और उनके तीन बच्चों ने संघर्ष के लिए अपना बचपन। मां का संघर्ष और पिता की शहादत से मिली प्रेरणा ने ऐसा बल दिया कि एक बार जो कदम बढ़े फिर थमे नहीं। संघर्ष की पतवार थामकर तीनों भाइयों ने जिंदगी को हालातों के मंझधार से बाहर निकालकर कामयाबी के करीब पहुंचाया।
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मूलरूप से नगला जयराम, अकोला के रहने वाले कारगिल युद्ध में शहीद हुए नायक श्यामवीर की शहादत की खबर परिजनों को नौ जुलाई 1999 को मिली। तब उनका बड़ा बेटा गजेंद्र १०, मझला नरेश सात और छोटा विजय साढ़े चार साल का था। गीता तो सुध-बुध खो बैठी थी। गजेंद्र और नरेश को पिता की शाहदत ने झकझोर दिया। विजय छोटा था, इसलिए उसे पता ही नहीं कि आखिर हुआ क्या है।
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समय गुजरा तो संघर्ष शुरू हुआ। गीता के सामने भी मुश्किल थी, एक तरफ पति के जाने का गम और दूसरी तरफ बच्चों के भविष्य की चिंता। अतीत का दामन छोड़, गीता बच्चों के कल को संवारने में लग गईं। गांव छोड़कर ताजनगरी फेस-2 में आ गए। इसके बाद तीन भाइयों ने न दिन देखा न रात, पढ़ाई में जुट गए। आर्थिक स्थिति ठीक न होने पर पैदल ही कई किलोमीटर दूर स्थित स्कूल जाया करते थे।
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बकौल विजय, जब बाकी दोस्त अपने पिता के साथ स्कूल आते थे तो उन्हें देखकर आंख भर आती थी। ट्यूशन पढऩे तो दूर टॉफी खाने तक के पैसे नहीं हुआ करते थे। बड़े बेटे गजेंद्र ने १०वीं पास की। तब तक सरकार की तरफ से पेट्रोल पंप मिल गया।
जिससे गजेंद्र पर पेट्रोल पंप संभालने की भी जिम्मेदारी आ गई। नरेश के अनुसार, भाइया (गजेंद्र) स्कूल से आने के बाद दिन में पेट्रोल पंप संभालते थे।। इस तरह से आर्थिक तंगी तो दूर होने लगी लेकिन संघर्ष पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गया।
दोनों बड़े भाइयों ने छोटे भाई को कभी कोई कमी महसूस नहीं होने दी। 12वीं पास करने के बाद गजेंद्र का एमबीबीएस में सलेक्शन हो गया, जिसके बाद नरेश ने परिवार की पूरी जिम्मेदारी संभाली। पढ़ाई के साथ-साथ वह पेट्रोल पंप संभालने लगा। अब गजेंद्र की एमबीबीएस लगभग पूरी होने वाली है, नरेश पेट्रोल पंप संभालने लगा है और विजय बीटेक कर रहा है।
मिलिट्री हॉस्पिटल में जाना चाहता है गजेंद्र
बड़ा बेटा गजेंद्र भी पिता की तरह से सेना में रहकर देशसेवा करना चाहता है। एमबीबीएस पूरी करने के बाद मिलिट्री हॉस्पिटल में ट्राई करेगा। यहां रहकर वह जवानों का इलाज करेगा। उसका कहना है कि पिता ने देश के लिए जो किया, वह तो नहीं कर सकता है। लेकिन देश के लिए जरूर कुछ करेगा।
कदम-कदम पर मां से ली प्रेरणा
शहीद श्यामवीर सिंह के तीनों बेटों के लिए मां गीता ही उनकी प्रेरणा है। पिता के शहीद होने के बाद भी जरूरत पड़ी तो मां ने सहारा दिया। जब पूरा परिवार हालातों से जूझ रहा था तो मां ने ही सभी को संभाला था। मां ने अपने तीनों बेटों को कभी पिता की कमी महसूस नहीं होने दी।