फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Maa Tujhe Pranam News ›   maa tujhe pranam, RN Sharma

मां ने गहने बेचे तो बेटे ने डॉक्टर बन सिर ऊंचा किया

Fri, 18 Jul 2014 03:24 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, आगरा
ब्यूरो/अमर उजाला, आगरा Updated Fri, 18 Jul 2014 03:24 PM IST
विज्ञापन
maa tujhe pranam, RN Sharma

वक्त, रिश्ते और धन, इनकी अहमियत उस शख्स से बेहतर कोई नहीं जानता जिसने पिता का प्यार पाने के वक्त को संघर्ष में गंवा दिया हो। चंद रुपयों की खातिर अपनों को पराया होता देखा, पढ़ाई के लिए मां को अपने गहने बेचते देखा हो।

विज्ञापन


इन सबके बावजूद उसने हालात का मुकाबला किया, क्योंकि सरहद पर शहीद पिता से संस्कारों में संघर्ष करना जो मिला था। तमाम हालात का मुकाबला कर यह शख्स खुद तो बाल रोग विशेषज्ञ बना ही, साथ ही पारिवारिक जिम्मेदारियों का भी निर्वहन किया।
विज्ञापन


पिता से मिली प्रेरणा का ही नतीजा है कि उन्होंने अपनी परामर्श फीस नहीं बढ़ाई। गरीब बच्चों का तो फ्री इलाज करते हैं। संस्कारों में मिली आदर्शों की इसी विरासत को 1971 में शहीद हुए नायब सूबेदार ब्रज किशोर शर्मा के बेटे डा. आरएन शर्मा ने जाया नहीं जाने दिया।
विज्ञापन
विज्ञापन


शहीद पिता के बारे में जब जिक्र हुआ तो अपने क्लीनिक पर बैठे डा. आरएन शर्मा कुछ देर के लिए शून्य में खो जाते हैं। फिर मुफलिसी के दिनों को याद करते हुए कहते हैं कि पिता की शहादत के बाद घर की स्थिति ठीक नहीं थी।

मां को 270 रुपये पेंशन मिलती थी। इसी से घर के खर्च के साथ-साथ मां को पांच बच्चों को पढ़ाना भी था। मां ने जैसे-तैसे जमा पूंजी से दो बहनों की तो शादी कर दी। अब दो बहनों की पढ़ाई और उनकी शादी का बोझ डा. आरएन शर्मा के कंधों पर था।

अपनी इस जिम्मेदारी के निर्वहन के लिए उन्होंने 12वीं पास करने के बाद बैंक में नौकरी शुरू कर दी। मेरठ में कुछ समय नौकरी करने के बाद एमबीबीएस में सेलेक्शन हो गया। इससे उन्हें नौकरी छोडऩी पड़ी। फिर से गृहस्थी की गाड़ी डगमगाने लगी।

बहनों की शादी के बाद मां के पास जमा पूंजी भी नहीं बची थी। कुछ चांदी के जेवर ही बचे थे, जिन्हें मां ने बेचकर आरएन शर्मा को  डाक्टरी की पढ़ाई कराई। इसके बाद उन्होंने पलटकर नहीं देखा। अपनी दोनों बहनों की शादी बड़े ही धूमधाम से की। 2007 में उनकी मां भी दुनिया छोड़कर चली गईं।

ससुरालीजनों ने नहीं लिया था दहेज
डा. आरएन शर्मा कहते हैं कि बड़ी बहन की शादी पिता ने तय कर दी थी। बाद में बहन के ससुराल पक्ष ने बिना दहेज के शादी की। आज उनकी सभी बहनें सुखी जीवन व्यतीत कर रही हैं।

तीन हजार रुपये में भी मांगी थी हिस्सेदारी
नायब सूबेदार ब्रज किशोर शर्मा जब शहीद हुए तब आरएन शर्मा छठवीं कक्षा में पढ़ते थे। सालों पुरानी धुंधली यादों पर रोशनी डालते कहते हैं कि रिश्तों की परख उन्हें बचपन में ही उस वक्त हो गई थी जब मां को शहीद पिता की ग्रेच्युटी के तीन हजार रुपये मिलने पर परिजन इसमें से भी हिस्सा मांग रहे थे। इसको लेकर काफी विवाद हुआ था।

 
क्लीनिक खोलने के लिए उधार ली थी रकम
एमबीबीएस करने के बाद आर्थिक स्थिति काफी बिगड़ चुकी थी। डा. शर्मा बताते हैं कि क्लीनिक खोलने के लिए भी उन्हें दस हजार रुपये उधार लेने पड़े थे। बाद में जब उनकी प्रैक्टिस चल पड़ी तब यह रकम लौटाई थी।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed